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राजस्थान की चित्रकला भाग 4

            मारवाड़ शैली :-
जोधपुर और उसके आस पास के क्षेत्र में।
इसको 6 भागो में बांटा जाता हैं।
इसके प्रारंभिक चित्र प्रतिहारकालीन 'ओध निर्यक्ति व्रति' में है।
अन्य ग्रन्थों में दशवैकालिक सूत्र(1060), उपदेशमाला प्रकरण व्रति (1156 में अजमेर), पांडव चरित्र (1468 नागौर), कल्पसूत्र (1551 नागौर), रागमाला(1623 पाली में वीर सिंह के समय), पंचाशिका प्रकरण व्रति(1150 पाली), दव्या श्रणय महाकाव्य(1255 जालौर), कालकाचार्य सूत्रकथा(1552नागौर) आदि।

A) जोधपुर शैली :-
1) इसका विकास मुख्य रूप से महाराजा जसवन्तसिंह और महाराजा मानसिंह ( शैली का स्वतंत्र प्रादुर्भाव) के समय हुआ।
2) इस शैली में मुख्य रूप से उत्तराध्ययन सूत्र, ढोला मारू, बिलावल रागिनी चित्र, रसिकप्रिया, सूरसागर पर आधारित चित्र, दुर्गा सप्तशती, नाथ चरित्र, ढोला मारवण री बात, कामसूत्र, पंचतन्त्र, वेली किसन रुक्मिणी री आदि।
3) मुख्यतः पीले व लाल रंग का प्रयोग व हाशिये पर पीले रंग का प्रयोग।
4) प्रमुख चित्रकार बिशनदास, नाथो, किशनदास, अमरदास, शिवदास, वीरजी, रतन जी , छज्जू, फेजअली, मतिराम, कालू, बभूत, नारयण दास आदि।
5) मुख्य रूप से लोकगथाओ व प्रेम आख्यानों, धार्मिक व नाथ सम्प्रदाय की पारम्परिक जीवनशैली का चित्रण का विषय है।
6) 1623 में वीरजी का रागमाला प्रमुख ग्रन्थ।
7) पुरुषों की आकृति में लंबा कद, गठीला बदन, मोटी गर्दन, तुर्रा कलंगी, अलंकृत ऊंची पगड़ी, धनुष समान बड़ी आँखे, मुख शौर्य से युक्त, घनी दाढ़ी मुंछ, सफेद गोल जामा, मोती की माला, हाथ मे तलवार।
8) स्त्रीयों की आकृति में अंग गठीले, मांसल चिबुक पर तिल का निशान, काले घने लम्बे बाल, बादाम जैसी आँखे, लम्बे हाथ, अंगुलियाँ पतली व लम्बी, पतली कमर, विकसित नाक, भौहें कानो तक लम्बी, ठेठ राजस्थानी लहँगा, ओढनी और लाल फुँदने का प्रयोग, आभूषण में मोती अधिक।
9) पशुओं में ऊँट व घोड़े पर सवार पुरुष व कुते की प्रमुखता। खंजन पक्षी का चित्रण।
10) आम के पेड़ का चित्रण।
11) विद्युत रेखाओ के साथ गोलाकार घने बादल।
12) राजसी वैभव के वस्त्राभूषण।

B) बीकानेर शैली:-
1) महाराजा रायसिंह के समय भागवतपुराण चित्रित किया गया इसको प्रारम्भिक चित्र माना जाता है। इनके समय उस्ता अलीरजा व उस्ता हामिद रुक्नुदिन बीकानेर आये।
2) इस शैली का सर्वाधिक पुराना व्यक्ति चित्र नूर मोहम्मद द्वारा बनाया गया।
3) विशुद्ध बीकानेर शैली का विकास महाराजा अनूपसिंह के समय। इनका काल सर्वोत्तम। इनके समय मुसव्विर रुक्नुदिन में रसिकप्रिया व बारहमास पर चित्र बनाये। साहबदीन ने भागवत पुराण पर ।
4) इस शैली के विकास में मुख्यतः दो परिवारों का योगदान
  मथेरण परिवार जो कि पारम्परिक जैन मिश्रीत राजस्थानी शैली में पारंगत।
  उस्ता परिवार मुगल शैली में पारंगत।
5) प्रसिद्ध चित्रकार रुक्नुदिन, उस्ता असीर खां, साहबदीन, अलीरजा, मुन्नलाल, मुकुंद, कायम, चन्दूलाल, जयकिशन, शाह मोहम्मद, जीवन, शिवराम, रामकिशन।
6) पुरुषों की आकृति में उग्रता, शिखरकार मारवाड़ी पगड़ी, दाढ़ी मूछों से युक्त वीरभाव, फैले हुए जामे, पीठ पर ढाल, हाथ मे भाले।
7) स्त्रियों की आकृति में आंखे कमल व मृगनयनी, उन्नत गर्दन, लम्बी नाक, धनुषाकार भृकुटि, पतले होठ, लम्बी इकहरी तन्वंगी कोमल नायिका, मोतियों के आभूषण, पारदर्शी ओढ़नी, घेरदार घाघरे।
8) प्रमुख विषय मे रसिकप्रिया, रागरागिनी, बारहमास, कृष्ण लीला, शिकार, तीज त्यौहार, धर्म ग्रन्थ, व्यक्ति  चित्रण, महफ़िल व सामंती वैभव।
9) इस शैली में जैन शैली व मुगल शैली चित्रों की नकल भी देखने को मिलति है।
10) मुख्यतः हरा, नीला व लाल रंग। पीले और लाल किनारे।
11) दक्षिण शैली से प्रभावित होकर सरोवर व नारियल के वृक्षों का चित्रण साथ ही उछलते फव्वारों का चित्रण।
12) लकड़ी की पट्टिकाओं और ऊँट की खाल पर चित्रण।
13) ऊँट ,हरिण और घोड़ों का चित्रण।
14) नीले आकाश में सुनहरे छल्लेदार ओर गोल सफेद बादल साथ ही बरसते बादलों में सारस मिथुन का चित्रण।
15) यह शैली मुगल व दक्षिण शैली से सर्वाधिक प्रभावित है।

C) किशनगढ़ शैली :-
1) इसको प्रकाश में लाने का कार्य एरिक डिकिन्सन और फैयाज अली का है ।
2) महाराजा किशनसिंह के समय पल्लवित।
3) सावन्तसिंह (नागरीदास) के समय चर्मोत्कर्ष पर। इनका समय स्वर्ण काल जिसमे मोरध्वज निहालचंद द्वारा बणी ठणी का राधा के रूप में चित्रांकन। इस चित्र में वल्लभीय अद्वेत वाद की चरम अभिव्यक्ति है।
4) प्रकृति के विस्तृत प्रांगण को चित्रित करने का श्रेय इसी शैली को ।
5) मुख्य चित्रकार सुरध्वज, मोरध्वज, निहालचंद, भंवरलाल, लाडलीदास, अमरू, सूरजमल, बदनसिंह, सीताराम, नानकराम, रामनाथ जोशी, सवाईराम आदि।
6) पुरुषों के चित्रों में समुन्नत ललाट, उन्नत स्कंध, पतले होठ, लम्बी गर्दन, लम्बी बाँहे व नाक, मादक भाव से युक्त आंखे नुकीली चिबुक, पेचबन्धी पगड़ियाँ, कमर में दुप्पटा, लंबा जामा, लम्बे छरहरे पुरुष।
7) स्त्रियों की आकृति में कमल व खंजन जैसी ऑंखे जिनकी काली रेखा कानो को छूती हो, चमेली की पंखुड़ियों जैसे होठ, अर्द्ध विकसित उन्नत खींचा वक्षस्थल, हाथ मे अर्द्ध पुष्पित कमल, लम्बे बाल, दीर्घ नाक, लम्बी सुराहीदार गर्दन, चाप के समान लम्बी भृकुटि, लहँगा, चोली, पारदर्शी ओढनी।
8) राधा के रूप सौंदर्य का चित्रांकन इस शैली का आकर्षण जो कि गीत गोविंद, भागवत पुराण, बिहारी चन्द्रिका आदि पर किया गया।
9) इस शैली मे रागरागिनी का चित्रांकन नही किया गया ।
10) सफेद और गुलाबी रंगों का मिश्रण। हाशिये पर गुलाबी व हरा रंग।
11) वेसरी इन चित्रों में अनोखा व प्रमुख आभूषण।
12) नारी सौंदर्य इस शैली की विशेषता।
13) काँगड़ा शैली और ब्रज साहित्य से प्रभावित।
14) नोका विहार व कुंजो से आच्छादित भवन।
15) भृमर मुख्यतः अंकित।


D) अजमेर शैली :-
1) इसके प्रमुख चित्रकारों में चाँद तैयब, नवला, रामसिंह, लालजी, नारायण, भाटी माधो जी, अल्लाबख्श, साहिबा आदि।
2) पुरुषों की आकृति में पुरूष लम्बे तगड़े, सुंदर, संभ्रांत, गोल आँखे, वीरोचित गुण, मूँछे छल्ले दार, लम्बी जुल्फें, सफेद जामा, मुगल और राठौड़ी पगड़ी, कमरबन्द, पजामा।
3) स्त्री आकृतियों में लंबे बाल, हाथों में मेहंदी, अंगुलियाँ पैनी, लहँगा, बसेड़ा, कचूकी, आभूषण, आकर्षक कोमलांगी महिला।
4) रंग योजना सुहानी जिसमे प्राकृतिक दृश्य अधिक, लाल पीले हरे व नीले रंगों के साथ बैंगनी रंग का प्रयोग।


E) नागौरी शैली :-
1) इसका सर्वाधिक रूप नागौर के महलों के भित्ति चित्रों में देखने को मिलता है।
2) यह जोधपुर, अजमेर, बीकानेर, मुगल, दक्षिणी शैलियों का मिश्रण है ।
3) इसमे नायक और नायिका की शबीह लम्बी, छोटी आंख, चपटा ललाट, परदाज से बनी झुर्रियों का सधा चेहरा।
5) बुझे रंगों का प्रयोग अधिक।
6) इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता पारदर्शी वेशभूषा है।


D) जैसलमेरी शैली :-
1) मूमल इस शैली का सबसे प्रमुख चित्र।
2) इस शैली का विकास महारावल हरराज, अखेसिंह, मूलराज आदि के काल मे ।
3) पुरूष आकृति में दाढ़ी मूछें, वीरता, ओज आदि का चित्रांकन।
4) इस शैली पर मुगल या जोधपुर शैली का प्रभाव नही , इसकी अपनी अलग विशेषता।
5) चित्रों में रंगों की बहुलता पायी जाती है।

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