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राजस्थान की चित्रकला भाग 3

      मेवाड़ शैली :-
  उस शैली का प्रथम उदाहरण1260 ई में चित्रित श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि है।
इस शैली पर अफगानी, हिन्दू, व मुगल प्रभाव है।
अन्य ग्रन्थों में a) विल्हण का - विल्हण पंचशिका
                   b)  सहबदीन के - भागवत(1648), रागमाला(1628), आर्शरामायण(1651), भरमर गीत(1659), शूकर क्षेत्र महातम्य(1655), गीतगोविन्द आख्यालिक
                   c) मनोहर का - रामायण(1649)
                   d) महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय :- जगमन्दिर, स्वर्ग से पराजित व्रक्ष को पृथ्वी पर लाना, धींगा गणगौर, गोवर्धन धारण प्रसंग, कलीला दमना, मुल्ला दो प्याजा के लतीफे, बिहारी सतसई आदि।
                   e) नसीरुद्दीन का - रागमाला सैट ।

इस शैली के 4 भाग है।

A) उदयपुर शैली :-
1) महाराणा जगतसिंह प्रथम द्वारा "चितेरों की ओवरी" नाम से कला विद्यालय खोला गया जिसको 'तस्वीरों रो कारखानों' भी कहते हैं। इनके दरबार मे नसीरुद्दीन, मनोहर, सहिब्दीन आदि चित्रकार थे। इनके काल को स्वर्ण काल कहा जाता है।
2) अन्य चित्रकारों में कृपाराम , उमरा आदि है।
3) महाराणा जयसिंह के समय सूरसागर, पृथ्वीराज रासौ, सारंगधर, रघुवंश, रसिकप्रिया, रामायण, महाभारत आदि का चित्रांकन हुआ।
4) प्रमुख विषय मे कृष्ण की लीलाओ का चित्रण, राम के चरित्र से सम्बंधित घटना, नायक नायिका भेद, रागमाला, बारहमास आदि।
5) पुरुष आकृति में कानो में मोती, सिर पर उदयपुरी पगड़ी, कपोल तक झुल्फ़े, छोटी गर्दन, लम्बी मूँछे, बड़ी आंखे, छोटा कद, गठीला शरीर, कमर में पटका, लंबा घेरदार जामा।
6) स्त्री आकृतियों में भौहें नीम के पत्ते जैसी, सरल भाव युक्त चेहरा, मीन जैसी आंखे, भरी हुई चिबुक पर तिल, गरुड़ सी सीधी लम्बी नाक, लम्बी वेणी, लहँगा व पारदर्शी ओढ़नी।
7) चमकीला पीले व लाख के रंगों की प्रधानता जिसमे हरे व नीले रंग का भी प्रयोग।
8) हाशिया लाल व पीली सादी पट्टी में चित्रित।
9) पशुओं में हाथी (मुख्यतः), शेर, हिरण, घोड़े का चित्रण बहुलता से।
10) गुर्जर व जैन शैली से प्रभावित।
11) पोथी ग्रन्थों का अधिक चित्रण।
12) प्रकृति का सन्तुलित व अलंकारिक चित्रण साथ ही चकोर, मयूर,  बकुला, हंस, मछलियों का चित्रण।
13) बदलो से युक्त नीला आकाश व कदम्ब के पेड़ का चित्रण।
14) महाराणा अमरसिंह के समय इस पर मुगल प्रभाव।


B) नाथद्वारा शैली :-
1) महाराजा राजसिंह के समय उद्भव व विकास।
2) तिलकायत श्री गोवर्धन जी के समय चर्मोत्कर्ष पर।
3) प्रमुख चित्रकार चतुर्भुज, नारायण, कमला, घीसाराम, इलायची, उदयराम, बिठुल, हरदेव, हीरालाल, देवकृष्ण, आदि।
4) पुरुष आकृतियों में गुसाइयो के पुष्ट कलेवर, नन्द और बाल गोपालों का भावपूर्ण चित्रण।
5) स्त्री आकृतियों में प्रौढ़ता, चकोर के समान आंखे, छोटा कद, शारीरिक स्थूलता, भावों में वात्सल्य।
6) मुख्यतः श्रीनाथ जी के विग्रह, कृष्ण चरित्र की बहुलता के कारण माता यशोदा, नन्द, बाल-ग्वाल, गोपियों इत्यादि का चित्रण।
7) हरे व पीले रंग की बहुलता। पृष्ठ भूमि पर नींबू पीला रंग।
8) इस शैली का उद्भव श्रीनाथ जी के स्वरूप की स्थापना के बाद।
9) केले के पेड़ों की प्रधानता व पृष्ठ भूमि पर वनस्पति की अधिकता।
10) आकाश में देवताओं का चित्रण।
11) पशुओं में गायों का चित्रण।
12) चित्रो में श्रीनाथ जी की केंद्रीय आकृति काली नील काँटी के रंग से अंकित।
13) पिछवाई चित्रण व भित्ति चित्रण प्रमुख।

C) देवगढ़ शैली :-
1) इस शैली के प्रमुख चित्रकार कँवला प्रथम, कँवला द्वितीय, चोखा,बगता, बैजनाथ आदि थे।
2) यह जोधपुरी शैली के समान है। यह मारवाड़ ,जयपुर व मेवाड़ की समन्वित शैली है।
3) इसमें पीले रंग की बहुलता है साथ ही मोटी और सधी हुई रेखाएँ।
4) इसको प्रकाश में लाने का काम श्रीधर अंधारे द्वारा किया गया।
5) इस शैली में राजसी ठाठ बाट, मरुस्थल के दृश्य, गोठ, सवारी , अन्तःपुर आदि का चित्रण।
6) इसके भित्ति चित्र अजारा की ओवरी व मोतीमहल में विद्यमान है।

D) चावण्ड शैली :-
1) महाराणा प्रताप व अमरसिंह के समय (इनके समय रागमाला चित्ररित।
2) प्रमुख चित्रकार नसिरदीन।


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