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राजस्थान की चित्रकला भाग 2

    ढूंढाड़ शैली :-
क्षेत्र :- जयपुर व उसके आस पास का । इसके 4 भाग हैं।

A) जयपुर शैली :- यह मुगल शैली से अत्यधिक प्रभावित है इस कारण इसके चित्रों को देख कर मुगल शैली के होने का भरम होता है।
1) सवाई जय सिंह के दरबारी चितेरे मुहम्मदशाह के समय इसमे मुगल शैली का प्रभाव अत्यधिक देखने को मिलता है। इस समय सुरतखाना नाम से चित्रकला विभाग की स्थापना की गई।
2) ईश्वरी सिंह के समय चितेरे साहिबराम द्वारा इनका आदम कद चित्र बनाया गया।
3) सवाई माधो सिंह प्रथम के समय रामजीदास ओर गोविंद प्रसिद्ध चितेरे।
4) महाराजा सवाई प्रताप सिंह के समय साहिबराम द्वारा महाराजा प्रताप सिंह के पोट्रेट व राधा कृष्ण के नृत्य से सम्बंधित चित्र बनाये गये। यह काल इस शैली का स्वर्ण काल था।
5) सवाई जगतसिंह के समय इस पर कम्पनी शैली का प्रभाव पड़ा।
6) महाराजा रामसिंह के समय कलाकारों के प्रोत्साहन के लिये मदरसा-ए- हुनरी की स्थापना की गई।
7) प्रमुख चित्रकार मुहम्मद शाह, साहिबराम, सालिगराम, घासी, रामजीदास, लालचंद, हुकमा, गनगबक्स, रघुनाथ, चिमना, निरंजन, जीवन, रामसेवक आदि।
8) पुरूष चित्र में चेहरा साफे और दाढ़ी के बिना, पगड़ी, चोगा, कुर्ता, पजामा, अंगरखी, कमरबन्द, पटका, जूते, हाथ मे तलवार व आँखे ख़ंजनाकार।
9) स्त्री चित्र में भरा हुआ शरीर जो कि सुहावनी मुद्रा में, लहंगा, चोली, कुर्ता, तिलक, बेसर, कामदार जूतियाँ, दुपट्टा, कद छोटा, होठ कपोल के समान, भौहें थोड़ी उठी हुई, लम्बे केश, आंखे मीन जैसी, चेहरा अंडाकार, उत्तम स्वास्थ्य।
10) प्रमुख रंगों में लाल, नीला, सफेद, पिला, हरा रंग प्रधान।
11) इस शैली में मुख्य रूप से रागमाला, कृष्णलीला, शिकार, युद्ध, रामायण, महाभारत, कामसूत्र, जयदेव की गीत गोविंद पर आधारित है।
12) आदमकद चित्र इस शैली की महत्वपूर्ण विशेषता है। भित्ति चित्रण व बड़े बड़े पोट्रेट भी इसी शैली में अधिक बने।
13) चित्रों की पृष्ठभूमि में उद्यान चित्रण महत्वपूर्ण।
14) अलंकारों में उभरते मोतियों ओर सोने की उभरी छपाई।
15)  शेर, चिता, हाथी, भेड़, बकरी, तोता, बतख, आदि का चित्रण।
16) पीपल, बड़, घोड़ा, मयूर और नीले बादलों का चित्रण।

B) अलवर शैली :-
1) राव राजा प्रतापसिह के समय का डालूराम द्वारा चित्रित शीशमहल इस शैली का प्रारंभिक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
2) महाराज विनयसिंह का काम स्वर्ण काल था।
3) प्रमुख चित्रकारों में डालूराम, सालिगराम, बलदेव, गुलामअली, बुद्धाराम, शिवकुमार, नानगराम आदि।
4) पुरूष आकृतियों में जयपुर जैसी पगड़ी, गले मे रुमाल, व कमर तक अंगरखा।
5) स्त्री आकृतियों में गोल मुँह, छोटा कद, भरी हुई चिबुक, होठ पतले व पान की पिक से रचे हुए, आंखे मीन सदृश, भौहें कमान जैसे तनी हुई, वेणी ऊँची उठकर लटकी हुई।
6) विनय सिंह द्वारा शेखसादी की "गुलिस्तां" को बलदेव व गुलाम अली से चित्रित करवाया गया।
7) अन्य चित्र चंडी पाठ व दुर्गा सप्तशती पर बने।
8) योगासन इस शैली का प्रमुख विषय रहा।
9) मूलचंद नामक चित्रकार हाथी दाँत पर चित्रकारी में प्रवीण।
10) वेश्याओं के चित्र केवल इसी शैली में शिवदानसिंह के समय कामशास्त्र के आधार पर बने।
11) चित्रो में सफेद बादल व शुभ आकाश।
12) हरे, नीले व सोने के रंग का अधिक प्रयोग।
13) बेलबूटेदार अलंकृत हाशिये जिसमें नीले व लाल रंग का प्रयोग।
14) इस शैली में ईरानी, मुगल और राजस्थानी शैली का मिश्रण है।

C) आमेर शैली :-
 यह ढूंढाड़ शैली की प्रारंभिक चित्र शैली है।
1) इस शेली का प्रारंभिक चित्रित ग्रन्थ पुष्पदत का आदिपुराण (1540 ई) है जो महाराजा मानसिंह प्रथम के समय चित्रित हुआ । एक अन्य यशोधर चरित्र भी उसी समय का है।
2) अकबर के रज्ज्बनामा में आमेर व मुगल शैली का समन्वय देखने को मिलता है।
3) मिर्जा राजा जयसिंह के समय रसिकप्रिया व कृष्ण रुक्मिणी री वेली का चित्रांकन किया गया।
4) प्रमुख चित्रकारों में हुकमचन्द, मुरली, मन्नालाल आदि।
5) इस पर मुगल प्रभाव अधिक।
6) पुरुषों व नारियों की बनावट राजस्थानी लोककला से प्रभावित।
7) इसके अधिकांश चित्र भित्ति चित्रों के रूप में उपलब्ध।
8) प्राकृतिक रंगों में हिरमिच, गेरू, कालुस, सफेदा, पेवड़ी आदि का प्रयोग।
9) बिहारी सतसई पर आधारित चित्रों का भी चित्रांकन ।


C) उणियारा शैली:-
1) जयपुर व बूंदी की सीमा पर बसे उणियारा के नरुका ठिकाने पर प्रादुर्भाव।
2) धीमा, मिरबक्स, काशीराम, बख्ता आदि प्रमुख चित्रकार।
3) प्रमुख चित्रो में कवि केशव की कविप्रिया पर आधारित चित्र, रागरागिनी, बारहमास, राजाओं व रानियों के व्यक्ति चित्र व धार्मिक चित्र।
4) कवला व बख्ता ने ठाकुर विशनसिंह के समय चित्रण किया।



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