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राजस्थान के लोक सन्त भाग 2

(1) संत सुंदर दास जी :- इनका जन्म दौसा के खण्डेलवाल वैश्य परिवार में हुआ इनके पिता श्री परमानन्द जी थे। ये दादु जी के शिष्य थे। दादु जी से दीक्षा लेकर इन्होंने उनके उपदेशों का प्रचार किया । इनके प्रमुख ग्रन्थ ज्ञान समुंदर, सुंदर सार, सुंदर ग्रन्थावली , ज्ञान सवैया आदि है। इनकी मृत्यु विक्रम संवत 1764 को सांगानेर में हुई। इन्होंने दादु पन्थ में नगा साधु वर्ग आरम्भ किया। इनका कार्य क्षेत्र नरायणा, दौसा, सांगानेर, फतेहपुर, शेखावाटी आदि रहा है।

(2) संत धन्ना जी :- इनका जन्म विक्रम संवत 1472 में टोंक के निकट धुवन गांव में जाट परिवार में हुआ । इसके गुरु संत रामानन्द जी थे उनसे दीक्षा लेकर इन्होंने भगवत भक्ति और धर्मोपदेश का प्रचार किया। ये ईश्वर भक्ति में लीन रहते थे । ईश्वर में दृढ़ विश्वास , बाहरी आडम्बरों और कर्मकाण्ड का विरोध ,संग्रह व्रती से मुक्त रह कर सन्तो की सेवा करना आदि इनके प्रमुख उपदेश थे।

(3) भक्त कवि दुर्लभ :- इनका जन्म वागड़ में विक्रम संवत 1753 में हुआ। ये राजस्थान के नृसिंह कहलाते है । इन्होंने कृष्ण भक्ति का उपदेश दिया और कृष्ण लीला के रास मत को बढ़ाया। इनका कार्य क्षेत्र बांसवाड़ा ओर डूंगरपुर था।

(4)संत शिरोमणि मीरा :- इनका जन्म मेड़ता के पास कुड़की गांव में सन 1498 में हुआ। इनके पिता श्री रतन सिंह जी राठौड़ बाजोली के जागीरदार थे। इनका जन्म नाम पेमल था । इनका लालन पोषण इनके दादा के मेड़ता में हुआ । इनका विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज के साथ हुआ , कुछ समय बाद इनकी मृत्यु हो गयी । मीरा जी सगुण भक्ति से सम्बंधित है इन्होंने भजन , नृत्य और कृष्ण स्मरण का मार्ग अपनाया। अंतिम समय मे मीरा जी गुजरात के डाकोर स्थित रणछोड़ मन्दिर में रही और वही गिरधर गोपाल में विलीन हो गयी । इनकी पदावलियाँ प्रसिद्ध है ।

(5)संत माव जी :- इनका जन्म साबला गांव डूंगरपुर के ब्राह्मण परिवार में हुआ । इनके द्वारा बेणेश्वर धाम में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात इसे बेणेश्वरधाम के रूप में स्थापित किया गया। यह स्थान माही नदी कि तट पर साबला गांव में है और यहाँ श्री कृष्ण का निकलंकी अवतार प्रतिष्ठित है। इनकी वाणी चौपड़ा है जिसमें इन्होंने वागड़ी भाषा मे कृष्ण लीलाओं की रचना की। माव जी ने निर्गुण और सगुण का समन्वय कर भक्ति के सर्वग्राही मार्ग को प्रतिष्ठित किया।

(6) ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती :- इन्हें गरीब नवाज भी कहा जाता है । इनका जन्म फारस के गांव संजरी में हुआ । इनके पिता हजरत ख्वाजा सैयद व माता बीवी साहेनूर थी। ख्वाजा साहब चौहान सम्राट पृथ्वीराज तृतीय के समय राजस्थान आये थे। इनके गुरु हजरत शेख उस्मान हारूनी थे। अजमेर इनकी कार्यस्थली था। इनकी प्रसिद्ध दरगाह भी अजमेर में ही है जहाँ उर्स का मेला भरता है। यह हिंदू मुस्लिम साम्प्रदायिक सदभवना का सर्वोत्तम स्थान है। यहाँ अकबर पुत्र प्राप्ति हेतु पैदल जियारत करने आये थे। इनका इंतकाल 1233 ई में हुआ।

(7) पीर फखरुद्दीन :- ये दाउदी बोहरा सम्प्रदाय के आराध्य पीर है । गलियाकोट डूंगरपुर में इनकी दरगाह है जो दाउदी बोहरा सम्प्रदाय का प्रमुख धार्मिक स्थल है।

(8) आलखिया सम्प्रदाय :- इसके प्रवर्तक स्वामी लाल गिरी जी थे । इनका जन्म चूरू जिले में हुआ। इस निर्गुण भक्ति सम्प्रदाय की पीठ बीकानेर में है। इसका प्रमुख ग्रन्थ अलख स्तुति प्रकाश है। बीकानेर में इनकी स्मृति में लाल पत्थर लगा हुआ है जहाँ नारियल चढ़ाया जाता है। लाल गिरी जी के कुण्डलिये प्रसिद्ध है।

(9) गूदड़ सम्प्रदाय :- संत दास जी के द्वारा इसका प्रवर्तन किया गया । इसकी प्रमुख गद्दी दंतड़ा ( भीलवाड़ा ) में है। यह निर्गुण भक्ति धारा से सम्बंधित है। संतदास जी द्वारा गुदड़ी के बने कपड़े पहने जाते थे इस कारण यह गूदड़ सम्प्रदाय कहलाया।

(10) नवल सम्प्रदाय :- इसके प्रवर्तक नागौर में जन्मे संत नवलदास जी थे। इनके उपदेश नवलेश्वर अनुभववाणी में है। इसका मुख्य मंदिर जोधपुर में है।

(11) राजाराम सम्प्रदाय :- राजाराम जी द्वारा इसका प्रवर्तन किया गया । यह सम्प्रदाय जातिगत संकीर्णता का विरोधी , मानवता और भातृत्व का संदेश देने वाला है। इन्होंने भी अधिकाधिक पेड़ो को लगाने ओर पेड़ो की कटाई को रोकने का संदेश दिया । ( विश्नोई सम्प्रदाय की तरह)

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