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राजस्थान के सगुण भक्ति धारा के संत भाग 2

वैष्णव मत के अन्य सम्प्रदाय
(1) निम्बार्क सम्प्रदाय :- इसकी स्थापना आचार्य निम्बार्क द्वारा की गई इनका वैष्णव दर्शन हंस सम्प्रदाय से भी जाना जाता है। ये तेलंग ब्राह्मण परिवार से थे। इन्होनें वेदांत पारिजात भाष्य लिखा और अपना नया दर्शन द्वेताद्वेत या भेदाभेद लिखा। इन्होनें राधा कृष्ण की भक्ति का उपदेश दिया और कृष्ण को परब्रह्म ओर राधा को उसकी शक्ति बताया। इसमे राधा को कृष्ण की परिणीति बताया गया है और उनके युगल स्वरूप की पूजा की जाती है। राजस्थान में इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ किशनगढ़ (अजमेर) के पास सलेमाबाद है जिसकी स्थपना परशुराम जी द्वारा की गई। परशुराम जी ने ब्रजभाषा मिश्रित राजस्थानी में परशुराम सागर लिखा। शेखावाटी क्षेत्र में इस मत का प्रसार ज्यादा है।

(2) वल्लभ सम्प्रदाय :- इसका प्रवर्तन वल्लभाचार्य द्वारा किया गया इनका जन्म वाराणसी में तेलंगाना के लक्ष्मण भट्ट ब्राह्मण के घर । इन्होंने अणु भाष्य की रचना की और शुद्ध द्वेत प्रतिपादन किया। इन्होंने व्रन्दावन में श्रीनाथ मन्दिर की स्थापना की। इस सम्प्रदाय में भक्ति को रस के रूप में प्रतिष्ठित किया। इनके पुत्र विट्ठलनाथ जी ने अष्ट छाप कवि मण्डल की स्थापना की जिन्होंने राधाकृष्ण की भक्ति की रचनाएं की ।
  औरंगजेब के काल मे मन्दिर को तोडने के डर से विट्ठलनाथ जी के वंशज गोस्वामी दामोदर जी और गोविन्द जी द्वारा श्रीनाथ जी की मूर्ति राजस्थान लाकर मेवाड़ राजा राजसिंह की अनुमति से बनास नदी के तट पर सिंहाड़ गांव जिसे नाथद्वारा कहा जाता है में स्थापित की और वर्तमान में यहाँ वल्लभ सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। इस सम्प्रदाय को पुष्टि मार्गी सम्प्रदाय भी कहते है। यहां पुष्टि का अर्थ भगवान की कृपा से है।
विट्ठलनाथ जी के 7 पुत्र थे जिन्होंने अपने आराध्यो की मूर्तियों को विभिन्न स्थानों पर प्रतिष्ठित किया जो इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठे है :- 
     1-मथुरेश जी, कोटा
     2- मदनमोहन जी, कामवन भरतपुर
     3-बालकृष्ण जी, सूरत गुजरात
     4-विट्टलनाथ जी, नाथद्वारा राजसमंद
     5-गोकुल चन्द्र जी, कामवन भरतपुर
     6-गोकुल नाथ जी, गोकुल उत्तर प्रदेश
     7-द्वरिकधीश जी, कांकरोली राजसमंद
इस सम्प्रदाय में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा न करके श्री कृष्ण के बाल रूप की उपासना की जाती है। इस सम्प्रदाय की एक विशेषता हवेली संगीत है।
किशनगढ़ के शासक सावन्तसिंह जी इस सम्प्रदाय के भक्त थे उन्होंने राजपाठ छोड़ कर व्रन्दावन जाकर कृष्ण भक्ति की ओर अपना नाम भक्त नगरी दास रखा।

(3) ब्रम्ह या गौड़ीय सम्प्रदाय :- मध्वाचार्य जी द्वारा इसे प्रवर्तित किया गया । यह भक्ति मत गौड़ स्वामी द्वारा अधिक प्रचलित जिस कारण इसे गौड़ीय सम्प्रदाय कहते है ।मध्वाचार्य जी ने पूर्णप्रज्ञ भाष्य की रचना कर द्वेतवाद जा प्रतिपादन किया। इसके अनुसार ईश्वर सगुण है और वह विष्णु है। उसका स्वरूप सत, चित व आनन्द है। इसे जन जन तक फैलाने का काम बंगाल के गौरंग महाप्रभु चैतन्य ने किया। उन्होंने राम लीला ओर संकीर्तन को कृष्ण भक्ति का माध्यम बनाया और व्रन्दावन में कृष्ण भक्ति की अजस्त्र धारा को प्रवाहित किया। आमेर के राजा मानसिंह ने व्रन्दावन में गोविन्द देव जी का मंदिर बनवाया। करोली का मदनमोहन मन्दिर भी इसी सम्प्रदाय से सम्बंधित है। जयपुर के सवाई जयसिंह ने चन्द्र महल के पीछे राधागोविंददेवजी जी का मंदिर बनवाया।

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