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राजस्थान के निर्गुण भक्ति धारा के संत भाग 2

(1) राम स्नेही सम्प्रदाय :- राजस्थान में 18वी शताब्दी में इस सम्प्रदाय की 4 शाखाओं की स्थापना की गई जो निम्न है
     रेण शाखा :- दरियावजी द्वारा ( मेड़ता, नागौर )
     शाहपुर शाखा :- रामचरण जी द्वारा (शाहपूरा, भीलवाड़ा)
     सिंहथल शाखा :- हरिराम दास जी द्वारा ( सिंहथल, बीकानेर)
     खेड़ापा शाखा :- रामदास जी द्वारा (जोधपुर)
   ये सभी रामानन्द शिष्य परम्परा से उत्पन्न हुई है ये निम्न प्रकार है :-
   a) रेण शाखा :- इसके संस्थापक संत दरियावजी जी थे अतः इसे दरियाव पंथ भी कहते है।  इनका जन्म जेतारण में जन्माष्टमी विक्रम संवत 1758 को हुआ। इनकी माता गिगण और पिता श्री मान जी धुनिया थे। इनके गुरु बाकल नाथ जी ( प्रेमनाथ जी ) रामस्नेही सम्प्रदाय से दीक्षित थे। इन्होनें ईश्वर के स्मरण व योग मार्ग का उपदेश दिया। इनकी मृत्यु रेण नागौर में विक्रम संवत 1815 को रेण में हुई इसे दरियावजी जी का देवल धाम के नाम से सम्बोधित करते है।
 इस पंथ में निर्गुण निराकार ब्रह्म (राम) की उपासना की जाती है। दरियावजी जी ने ऊंच नीच , भेदभाव, आडम्बर के विरोध के साथ शुद्धता , पवित्र आचरण, भोग विलास का त्याग , साधु संगति और धार्मिक सदभवना पर बल दिया । इन्होंने राम में रा को राम और म को मुहम्मद का प्रतीक बताया तथा बताया कि इन दोनों शब्दों में ही वेदों और पुराणो का सार समाहित है। गृहस्थ जीवन मे रहते हुए गुरु भक्ति व राम नाम स्मरण को मोक्ष का साधन बताया। इन्होंने अन्य सन्तो की तरह स्त्री जाति की निंदा नही की।

   b) शाहपुरा शाखा :- इसकी स्थापना रामचरण जी द्वारा की गई। इनका जन्म सोडा ग्राम जयपुर में 24 फरवरी1720 ई को हुआ । इनके पिता बख्तावर जी विजयवर्गीय थे। इनके बचपन का नाम रामकिशन था। इन्होंने अपने गुरु कृपा राम जी से दांतड़ा (मेवाड़) में दीक्षा ली। इनके ग्रन्थ का नाम अर्नभ वाणी है । राम चरण जी ने सर्वप्रथम भीलवाड़ा फिर कुहाड़ा गाँव तथा अंत मे शाहपुरा में निराकार-निर्गुण परब्रह्म राम की निर्गुण भक्ति का उपदेश दिया । मृत्यु 5 अप्रैल 1798 को शाहपुरा (भीलवाड़ा) में हुई। इनका राम दशरथ पुत्र राम न होकर कण कण में व्याप्त निर्गुण निराकार ब्रह्म है। इस सम्प्रदाय में निर्गुण भक्ति व सगुण भक्ति की रामधुनी व भजन कीर्तन की परम्परा के समन्वय से राम की उपासना की जाती है। ये बाह्य आडम्बरों, जातिगत भेदभाव का विरोध, गुरु की सेवा, सत्संग, राम नाम स्मरण आदि प्रमुख शिक्षा है। इस सम्प्रदाय का फूलडोल महोत्सव प्रसिद्ध है।

    c) सिंहथल शाखा :- इसकी स्थापना हरिराम दास जी द्वारा की गई । एक जन्म और मृत्यु दोनो सिंहथल बीकानेर में हुए। इनके पिता श्री भागचन्द जी जोशी व माता रामी थी । इन्होंने अपने गुरु श्री जैलम दास जी रामस्नेही से दीक्षा ली और इस शाखा की स्थापना की। इनकी वाणी का संकलन निसानी नामक ग्रन्थ में है जिसमें प्रणायाम , समाधि और योग के तत्वों का उल्लेख है। ये निर्गुण ब्रह्म की भक्ति, गुरु सेवा पर बल, राम नाम का स्मरण व गुरु को पारस पत्थर से भी उच्च मानते है तथा आडम्बर ,जाति पाती का विरोध मूर्ति पूजा का विरोध व बहुदेव वाद को नही मानते ।

    d) खेड़ापा शाखा :- इसकी स्थापना संत रामदास जी द्वारा की गई। इनका जन्म भीकमकोर गांव में हुआ इनके पिता श्री शार्दूल व माता अणमी था। इन्होंने श्री हरिराम दास जी से दीक्षा ली और इस शाखा की स्थापना की । इनकी मृत्यु खेड़ापा में आषाढ़ कृष्ण सप्तमी को हुई। इस सम्प्रदाय में सतगुरु की सेवा और सत्संग पर बल दिया जाता है। इस सम्प्रदाय में साधुओ को 4 श्रेणी में रखा गया है।
    विरक्त :-  ये नंगे बदन, नंगे पांव व नंगे सिर रहते है।
    विदेह :- सिर्फ एक लँगोट तीन हाथ कपड़ा और कमण्डल रखते है।
    परमहंस :- ये बिल्कुल नंगे रहते है।
    प्रवर्ति :- ये सिले कपड़े पहनते है, टोपी और पगड़ी भी रखते है साधु सेवा नाम पर रुपये लेते है व उधार भी देते है।
    गृहस्थ :- ये रामस्नेही की आचार सहिता का यथा शक्ति पालन करते है ।

(2) निरंजनी सम्प्रदाय:-  इसकी स्थापना सन्त हरिदास जी ने की । इनका जन्म डीडवाना नागौर के पास कापडोद गांव में हुआ । इनका मूल नाम हरिसिंह सांखला था। ये लुटेरे थे। एक सन्यासी के उपदेश सुनकर इनको ज्ञान प्राप्त हुआ। इन्होंने निर्गुण भक्ति का उपदेश दिया। इनके प्रमुख ग्रन्थ मन्त्र राज प्रकाश और हरी पुरूष जी की वणी है। इनकी मृत्यु गाढ़ा डीडवाना नागौर में हुई वही इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। इस पंथ के निर्गुण होते हुए भी इसमें सगुण भक्ति व प्रेम भक्ति की उपासना की छूट है। यह सम्प्रदाय मूर्ति पूजा का खंडन नही करता न ही जाति व्यवस्था और वर्ण आश्रम का विरोध करता है यह एक समन्वय वादी पन्थ है इसमे परमात्मा को अलख निरंजन , हरि निरंजन कहा जाता है । इसके अनुयायी निरंजनी कहलाते है। ये 2 प्रकार के होते हैं:-
     निहंग :- जो वैरागी जीवन जिते है।
     घरबारी :- ग्रहस्थ जीवन वाले ।

(3) चरणदासी सम्प्रदाय :- इसकी स्थापना चरणदास जी ने की । इनका जन्म भाद्रपद शुक्ला तृतीय विक्रम संवत1760 में डेहरा अलवर में हुआ । इनका मूल नाम रणजीत था। इनके गुरु मुनि शुकदेव थे इन्होने ही इनका नाम चरणदास रखा। चरणदास जी के लिखित ग्रन्थ ब्रह्म ज्ञान सागर, ब्रह्म चरित्र, भक्ति सागर, ज्ञान सर्वोदय आदि है। ये पिले रंग के वस्त्र पहनते थे । इन्होंने नादिरशाह के आक्रमण की भविष्यवाणी की थी। इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ दिल्ली में है। यह पन्थ सगुण ओर निर्गुण भक्ति मार्ग का मिश्रण है क्योंकि इसमें निर्गुण निराकार ब्रह्म की सखी भाव से भक्ति की जाती है। इसमें कृष्ण लीलाओं का अधिक महत्व है । इस सम्प्रदाय के 42 नियम है । गुरु के सानिध्य को अधिक महत्व दिया जाता है । योगीश्वर कृष्ण की भक्ति की जाती हैं। कर्मवाद को मान्यता है । नैतिक शुद्धता पर बल व करुणा का महत्व है।  मेवात और दिल्ली में इस मत का प्रभाव अभिक है।




  

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