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राजस्थान के लोक देवता भाग 1

राजस्थान के लोक देवताओं में पंच पीर कहे जाने वाले देवता प्रमुख है जो कि निम्न है:- पाबु जी राठौड़ , रामदेव जी , गोगा जी चौहान, हरबू जी तथा मेहा जी ।
(1) गोगा जी:- जन्म विक्रम संवत 1003 को चूरू जिले के ददरेवा गांव में हुआ जिसे शीर्ष मेड़ी के नाम से जाना जाता है। पिता का नाम जेवर सिंह तथा माता का नाम बाछल देवी । इनके गुरु गौरख नाथ जी । विवाह कोलूमण्ड की राजकुमारी केमल दे के साथ ।
सर्प दंश से मुक्ति के लिए इनकी पूजा की जाती है ।
भाद्रपद कृषण नवमी को इनकी स्मृति में मेला लगता है । इनकी मृत्यु गौ रक्षार्थ व मुस्लिम आक्रांताओ ( महमूद गजनवी ) से देश की रक्षार्थ हुई मेहा जी बीठू कृत गोगाजी रा रसावल में इस युद्ध का वर्णन। गजनवी द्वारा इन्हें जाहर पीर की उपाधि दी गयी तथा मुसलमान इन्हें गोगा पीर कहते है ।कायमखानी मुसलमान इनको अपना वंशज मानते है।
 इन्हें साँपो का देवता कहा जाता है । राजस्थान के किसान इनके नाम की राखड़ी वर्षा के बाद हल जोतने से पहले हल ओर हालि दोनो को सर्प दंश के बचाव हेतु बांधते है जिसे गोगाराखडी कहते है ।
इनकी समाधि नोहर हनुमानगढ़ में है जिसे गोगामेड़ी या धुरमेड़ी कहते है ।
गोगाजी की ओल्डी किलोरियों की ठाणी सांचोर जालोर में है ।
इनकी सवारी नीली घोड़ी है जिसे गोगा बप्पा कहते है ।
इनका प्रतीक भाला लिए योद्धा है तथा इनका थान खेजड़ी के पेड़ के नीचे होता है ।

(2)पाबु जी :- जन्म 13वी शताब्दी में कोलूमण्ड फलौदी जोधपुर में धांधल व कमल दे के घर हुआ ।
विवाह अमरकोट के राजा सूरजमल सोढा की पुत्री सुप्यार दे से होना तय हुआ परन्तु ये फेरो के बीच से ही उठ कर अपने बहनोई जिन्दावर खींची से देवल चरनी की गाये छुड़ाने चले गए । इसी दौरान देंचु गांव में युद्ध करते हुए इनकी मृत्यु हो गयी । ये गौ रक्षक देवता के रूप में पूजे जाते है। ये लक्ष्मण के अवतार के रूप में भी जाने जाते है ।
मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊंट इनके द्वारा ही लाये गए ।इन्हें प्लेग रक्षक व ऊँटो के देवता के रूप में भी जाना जाता है। ऊँटो की पालक रेबारी (राइका)जाति इनको आराध्य मानती है व मेहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर कहते है ।
 इनकी घोड़ी केसर कमली तथा प्रतीक बायीं ओर झुकी पग व बोध चिन्ह भाला है इस कारण इनको भाल्यालो कहते है।
कोलूमण्ड में इनका मेला चैत्र अमावस्या को भरता है ।
इनके गीत पाबूजी के पावड़े माठ वाद्य के साथ नायक व रेबारी जाति द्वारा गाये जाते है तथा इनकी फड़ रावणहत्था वाद्य के साथ बाँची जाती है इस फड़ की रचनाकर देवल बाई चारणी को माना जाता है तथा इस फड़ का सर्वप्रथम चित्रण धूलजी नामक चित्रेरे द्वारा किया गया। थोरी जाति द्वारा "पाबु धणी री वाचना " नाम से सारंगी वाद्य के साथ इनका यश गया जाता है ।
आशिया मोड़ जी द्वारा पाबु प्रकाश नाम से इनकी जीवनी लिखी गयी है ।

(3)बाबा रामदेव जी :- इनको रामसा पीर, ,रूणिचा रा धणी नाम से जाना जाता है ।
जन्म भाद्रपद शुक्ल तृतीया संवत 1462 को बाड़मेर की शिव तहसील के उण्डू गांव में तथा इनके द्वारा समाधि भाद्रपद सुदी एकादशी संवत 1515 को रूणिचा के राम सरोवर के किनारे ली गयी।
पिता तंवर ठाकुर अजमाल जी व माता मैणादे। गुरु बालीनाथ जी ।विवाह अमरकोट के सोढा राजपूत दले सिह की पुत्री नेतलदे के साथ।
हिदू इनको कृष्ण का अवतार तथा मुसलमान इनको रामसा पीर कहते है।
इनके द्वारा भैरव राक्षस को मार कर पोकरण कस्बे को पुनः बसाया ओर रूणिचा में राम सरोवर का निर्माण किया गया।
मुख्य मंदिर रूणिचा में भाद्रपद शुक्ला द्वितिया से एकादशी तक मेला भरता है जो साम्प्रदायिक सदभवना के लिए प्रसिद्ध है।
मक्का से आये पाँच पीरो को इनके द्वारा अपना चमत्कार दिखाया गया।
इनके द्वारा कामड़िया पंथ चलाया गया । इस मेले में कामड़ जाति की स्त्रियों द्वारा तेरहताली नृत्य किया जाता है।इनके भक्त जनों को रिखिया कहते है। जिनके द्वारा इन्हें कपड़े का घोडा चढ़ाया जाता है।
इनका प्रतीक चिन्ह खुले चबूतरे पर ताख(आला) बनाकर उसमें इनके पगल्ये( चरण चिन्ह) रखे जाते है। मंदिर को देवरा कहते है , पांच रंग की ध्वजा को नेजा फहराई जाती है , रात्रि जागरण को जम्मा कहते है । इनके चमत्कारों को पर्चा तथा भजन को ब्यावले कहते है। इनके घोड़े का नाम लीला था।
इनके द्वारा रचित ग्रन्थ चौबीस बाणिया है।
अन्य मंदिर जोधपुर में मसूरिया पहाड़ी पर, बिरंटिया अजमेर एवम सुरता खेड़ा चित्तौड़गढ़ में है। इनकी बावड़ी पोकरण में है।
इनकी शिष्या डालीबाई ने इनसे एक दिन पूर्व समाधि ली थी इनका मंदिर भी रुणिचा में है।
इनके द्वारा छुआछूत का बहिष्कार कर सभी जातियों के साथ समान व्यवहार किया गया।

(4)हड़बूजी :- जन्म भूडोल नागौर में राजा मेहाजी सांखला के घर। ये रामदेवजी के मोसेरे भाई थे। गुरु बालीनाथ जी। राव जोधा के समकालीन। इनके आशीर्वाद से जोधा जी ने कई प्रदेश जीते।इनके द्वारा जोधा जी को कटार भेट की गई।
बेंगटी फलोदी में इनका पूजा स्थान जिसमे सांखला राजपूत पुजारी होता है।यहाँ इनकी गाड़ी की पूजा की जाती है इसमे ये पंगु गायों के लिए घास लेकर आते थे।
ये शकुनशास्त्र के ज्ञाता थे।

(5)मेहा जी :-माँगलियो के इष्ट देव कहे जाते है।
राव चूड़ा के समकालीन।
जैसलमेर के राव राणगदेव से युद्ध मे वीरगति को प्राप्त।
बापणी में मंदिर ।भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी को माँगलियो राजपूत इनकी अष्टमी मानते है।
घोड़े का नाम किरड़ काबरा था।
इनके भोपो की वंश व्रद्धि नही होती।


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