Recent Posts

राजस्थान के सगुण भक्ति धारा के संत भाग -1

(1)शैव मत :- भगवान शिव के उपासक शैव कहे जाते है । इनकी उपासना कई नामो से की जाती है जैसे एकलिंग, गिरिपति, समाधिश्वर, शम्भू, पिनाकिन, चन्द्रचूड़ इत्यादि । कालीबंगा और सिंधु सभ्यता के उत्खनन में भी शिव की पुजा के साक्ष्य मिले हैं। राजस्थान में मिले अभिलेखों के अनुसार यहाँ शैव धर्म सर्वप्रमुख था विशेषतः मेवाड़ ( लकुलीश) और मारवाड़ (नाथ सम्प्रदाय) रियासतों में ।
 शैव मत के 4 सम्प्रदाय है :-
    a) कापालिक सम्प्रदाय :- इसमे भैंरव को शंकर का अवतार मान कर पूजा जाता है । ये शमशान वासी, चिता भस्म रमने वाले अघोर तांत्रिक होते है । मुण्डमाल, सुरापान, नरबलि का नैवेद्य इनके प्रमुख लक्षण है ।
    b) पाशुपत सम्प्रदाय या लकुलीश सम्प्रदाय :- इसके प्रचारक दण्ड धारी लकुलीश थे। इनको शिव का अठाइसवा और अंतिम अवतार माना जाता है। हारित ऋषि (मेवाड़) इस सम्प्रदाय के साधु थे। उदयपुर का  एकलिंगजी मन्दिर इस सम्प्रदाय का सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिर जिसे बापा ने बनवाया। उदयपुर के महाराणा एकलिंगजी को उदयपुर का राजा और स्वयं को उनका दिवान मानकर शासन करते थे। इस सम्प्रदाय के साधु दिन में कई बार नहाते है और हाथ मे दण्ड धारण करते है।
     c) लिंगायत सम्प्रदाय या वीर शैव :- इसे हाल ही में पृथक धर्म का दर्जा दिया गया है ।
     d) काशमिरिक

(2) नाथ सम्प्रदाय :- यह शैव मत का प्राचीन सम्प्रदाय है इसके प्रवर्तक नाथ मुनि माने जाते है जो मध्य काल से सम्बंधित है ।इसके प्रमुख साधु मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, भर्तहरि इत्यादि है।
जोधपुर इसका महत्वपूर्ण केंद रहा है । यहाँ के राजा मान सिंह नाथ मत के गुरु आयस नाथ के अनुयायी थे ।
इसकी 2 शाखा है:-
   a) बैराग पंथ :- इसका मुख्य केंद्र पुष्कर के पास राता डूंगा है ।इसके प्रचारक भर्तहरि थे ।
   b) मान नाथी पंथ :- इसका मुख्य केंद जोधपुर जो राजा मानसिंह ने बनवाया ।
 नाथ सम्प्रदाय के साढे बारह पंथों है। इनमें से एक कानपा पंथ है जिसके प्रवर्तक जलन्धर नाथ थे । ये कालबेलिया के गुरु कहे जाते है।

(3) शाक्त सम्प्रदाय :- शक्ति अर्थात दुर्गा की पूजा । प्राचीन खुदाई से प्राप्त मिली चीजो ज्ञात होता है कि शक्ति के रुप मे देवी की पूजा की जाती थी। राजस्थान में भी विभिन्न राजवंश में शक्ति की पूजा करते थे ।
  शाक्त मत के दो पंथ है :-
    a) दक्षिणाचारी
    b) वामाचारी :- ये अनुयायी पंचकर्म से साधना करते है जिससे मद्य, मुद्रा, मैथुन, मत्स्य, मांस आते है।

(4) वैष्णव सम्प्रदाय :- विष्णु और उसके 10 अवतार को प्रधान मानकर पूजा करते है। राजस्थान में इस धर्म का सर्वप्रथम उल्लेख घोसुंडी अभिलेख में मिलता है। इस धर्म मे ईश्वर प्राप्ति हेतु भक्ति , कीर्तन, नृत्य आदि की प्रधानता होती है। दक्षिण भारत मे इसे फैलाने का काम तमिल के अलवार सन्तो द्वारा किया गया ।
इसके प्रमुख सम्प्रदाय :-
   a) रामानुज (रामावत) सम्प्रदाय :- जन्म 1710 ई आंध्र प्रदेश के तिरुपति नगर में हुआ। ये अलवार संत यमुनाचार्य के प्रधान शिष्य थे। अपने गुरु की अंतिम इच्छा को पूरा करने इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर श्री भाष्य लिखा । भक्ति का नया दर्शन विशिष्ट द्वेत आरम्भ किया । इसमे राम को परब्रह्म मानकर उसकी पूजा की जाती है इसलिये इसे रामावत सम्प्रदाय भी कहते है।
   b) रामानंदी सम्प्रदाय :- रामानंद शिष्य परम्परा के पांचवे शिष्य जिन्होंने उत्तर भारत मे भक्ति का प्रचार किया तथा इनके द्वारा प्रवर्तित मत रामानन्दी सम्प्रदाय कहलाता है जिसमें ज्ञानमार्गी भक्ति की प्रधानता थी । भेदभाव ऊंच नीच को समाप्त कर समानता के तत्वों को एक सूत्र में बांधा । पीपाजी, कबीर, धन्नजी, रैदास आदि इनके प्रमुख शिष्य थे। इनकी भक्ति दास्य भाव की थी।
   राजस्थान में इस सम्प्रदाय की शुरुआत संत श्री कृष्ण दास जी पयहारी द्वारा की गई । ये अनन्ता नन्द जी के शिष्य थे। इन्होंने गलताजी जयपुर में नाथपंतियो को शास्त्रार्थ में हरा कर इस सम्प्रदाय की स्थापना की।
   पयहारी जी के शिष्य अग्र दास जी ने  सीकर के पास रैवासा ग्राम में इसकी एक और पीठ स्थपित की इन्होंने राम की माधुर्य भाव से पूजा की जिस तरह से श्रीकृष्ण की की जाती है। अतः इनके मत को रसिक सम्प्रदाय भी कहा जाता है । जयपुर के राजा सवाई जयसिंह रामानन्द सम्प्रदाय को आश्रय दिया और राम रासा ग्रन्थ लिखा । 

Post a Comment

0 Comments