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राजस्थान के निर्गुण भक्ति धारा के संत भाग 1

(1) जसनाथजी सम्प्रदाय :- स्थापना जसनाथ जी द्वारा। ये श्री हम्मीर जी जाट और रूपादे के पोष्य पुत्र थे । एक जन्म कतरियासर ( बीकानेर )  में कार्तिक शुक्ल एकादशी विक्रम संवत 1539 को हुआ । यही इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। ये गोरखनाथ जी के पंथ में दीक्षित हुए और गोरख मालिया बीकानेर में कठिन तपस्या कर इन्होंने ज्ञान प्राप्त किया और निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना का उपदेश दिया। 24 वर्ष की आयु में कतरियासर में अश्विन शुक्ला सप्तमी विक्रम संवत 1563 को जीवित समाधि ली । इनके उपदेश सिम्भूदड़ा और कोंडा ग्रन्थ में संग्रहित है।
   इस सम्प्रदाय में निर्गुण भक्ति को ईश्वर साधना का मार्ग बताया । इसके अनुयायी गले मे काली ऊन का धागा पहनने है और भगवा वस्त्र धारण करते है । जीवित समाधि लेते है। इस सम्प्रदाय की एक अन्य विशेषता धधकते अंगारो पर नृत्य करते हुए चलना । ये लोग जाल के व्रक्ष और मोर पंख को पवित्र मानते है। इसके अधिकांश अनुयायी जाट होते है। अनुयायियों के लिए 36 नियम है जिनका उद्देश्य व्यक्ति व समाज के आचरण को शुद्ध व मर्यादित करना है जिनमें ईश्वर में आस्था, अहिंसा का पालन, कर्मवाद के सिद्धांतों को मान्यता, नित्य स्नान कर भोजन करना, गुरु के मार्ग व दर्शन का महत्व, धर्मिक पाखण्डों का विरोध, पशु बलि व मूर्ति पूजा का विरोध आदि आते है।

(2) विश्नोई सम्प्रदाय :- इसकी स्थापना जाभो जी द्वारा की गई । इनका अन्य नाम जम्भनाथ जी है। इनका जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी विक्रम संवत 1508 को पीपासर गांव नागौर में हुआ। इनके पिता पंवार वंशीय राजपूत ठाकुर लोहट व माता हंसा देवी थी । इस सम्प्रदाय का आरम्भ कर इन्होंने विष्णु की निर्गुण निराकार ब्रह्म के रूप मे उपासना का उपदेश दिया। मोक्ष प्राप्त करने हेतु गुरु के महत्व, विष्णु नाम जप तथा सत्संग के महत्व को प्रतिपादित किया । इनके रचित ग्रन्थ जम्भसागर, जम्भ संहिता, विश्नोई धर्म प्रकाश आदि है। इसकी मृत्यु मुकाम तालवा (नोखा, बीकानेर) में हुई यहि इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है । यह सम्प्रदाय 29 नियमो के पालन का आदेश जिसमे जीवो पर दया, प्रतिदिन सवेरे स्नान, हरे व्रक्ष के काटने पर रोक, नशीली वस्तुओं के सेवन पर रोक, हवन आरती व विष्णु भजन करना, चरित्र की पवित्रता बनाये रखना, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का त्याग, स्वच्छता का पालन आदि हैं। पर्यावरण संरक्षण हेतु प्राणों का बलिदान देने हेतु यह सम्प्रदाय प्रमुख है । विष्णु की उपासना ओर 29 (20+9) नियमों पर बल देने के कारण यह सम्प्रदाय विश्नोई कहलाता है। अन्य तीर्थो में जाम्भा फलौदी जोधपुर, रमाडा वास पीपाड़ जोधपुर, जागुल बीकानेर आदि है।

(3) लालदासी सम्प्रदाय :- इसकी स्थापना लालदास जी द्वारा की गई । इनका जन्म धोली दुव अलवर में विक्रम संवत1597 में हुआ। इनके पिता श्री चांद मल व माता समदा जी थी । ये मेव जाति के लकड़हारे थे। इनके गुरु तिजारा के मुस्लिम सन्त गद्यन चिश्ती थे । लालदास जी ने निर्गुण भक्ति का उपदेश दिया। इनकी मृत्यु नगला गांव भरतपुर में हुई और इनकी समाधि शेरपुर अलवर में है। इस सम्प्रदाय के प्रमुख स्थल शेरपुर और धोली दुव गांव है, यहाँ वार्षिक मेला भरता है। इन्होंने ईश्वर की सर्वशक्तिमान, निर्गुण निराकार और सर्वत्र माना जिसके स्मरण मात्र से सारे दुख दूर हो जाते है। ये ऊंच नीच भेदभाव की समाप्ति, हिंदू मुस्लिम एकता, रूढ़ियों और आडम्बरों का विरोध, दृढ़ चरित्र और नैतिकता की प्राप्ति, समाजिक सदाचार पर बल देते है। इस सम्प्रदाय में पुरुषार्थ पर बल दिया जाता है। इनके साधू कमा कर खाते है, किसी पर आश्रित नही रहते है। अलवर और भरतपुर के मेव जाति के लोग इनके अनुयायी है।

(4) दादू पंथ :-  इसकी स्थापना संत दादु जी द्वारा की गई। इनका जन्म चैत्र शुक्ला अष्टमी विक्रम संवत1601को अहमदाबाद में हुआ। ऐसा माना जाता है कि ये लोदीराम जी को नदी में सन्दूक में मिले। इनके गुरु कबीर के शिष्य श्री व्रन्दावन जी थे । दादु सम्प्रदाय की स्थापना की इनकी कर्मभूमि राजस्थान रही । इन्होंने मूर्ति पूजा , आडम्बरों और भेदभाव का विरोध कर निर्गुण निरंजन ब्रह्म की उपासना व ज्ञान मार्ग पर चलने की शिक्षा दी । इनके प्रमुख शिष्य माधोदास जी, गरीबदास जी, मिस्कीनदास जी, जगन्नाथ जी, आदि थे । इनके प्रमुख ग्रन्थ और उपदेश सधुक्कड़ी भाषा मे लिखे गए है । इनकी मृत्यु ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी विक्रम संवत1660 को नरायणा जयपुर में हुई। दादु जी ने समाधि ददुखोल (अन्य नाम ददुपालकी) नामक गुफा जो नरायणा में भैराणा पहाड़ी पर है। इनको राजस्थान का कबीर कहा जाता है क्योंकि इन्होंने लोक भाषा मे निर्गुण भक्ति को फैलाया।  इस सम्प्रदाय की पीठ नरायणा जयपुर में है । इस पंथ के सत्संग को अलख दरीबा कहते है। इसके अनुयायी 4 प्रकार के होते है :-
    खालसा :- गरीबदास जी की आचार्य परम्परा से सम्बंधित ।
    विरक्त :- रमते फिरते गृहस्थीयो को दादु धर्म का उपदेश देने वाले ।
    उत्तरादे व स्थानधारी :- जो राजस्थान छोड़कर उत्तरी भारत मे चले गए।
    खाकी :- जो शरीर पर भस्म लगते है व जटा रखते है। इसमें नगा साधू भी आते है जो वैरागी होते है शस्त्र रखते है वस्त्र नही पहनते हैं।
    दादु पन्थ के साधु विवाह नही करते गृहस्थी के बच्चों को गोद लेकर अपना पंथ चलाते है। जाति , वर्ग , ढोंग, बाह्य आडम्बर का इस पंथ में घोर विरोध होता है। मनुष्य के अंत करण को सच्चा उपासना गृह माना गया है। अहम का परित्याग, नियम , साधु संगति, हरि स्मरण, संयम, अंतर्ध्यान , सद्गुरु का मार्ग आदि को ब्रह्म की उपासना का साधन बताया गया है।
     दादु के 52 प्रमुख शिष्य दादु पन्थ के 52 स्तम्भ कहलाते है। जिनकी विभिन्न स्थानों पर गद्दियां स्थापित है । नरायणा में प्रति फाल्गुन शुक्ल पँचवी से एकादशी तक मेला भरता है।

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