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राजस्थान के लोक सन्त भाग 1

(1) संत पीपा :- इनका जन्म गागरोण के राजा कड़ावा राव खींची के घर हुआ इनकी माता लक्ष्मीवती थी। इनका मूल नाम प्रताप सिंह था। इन्होंने सन्त रामानन्द से दीक्षा ली । इनके द्वारा भागवत भक्ति का प्रचार किया गया। बाड़मेर के समदड़ी गांव में इनका मन्दिर है जहाँ प्रति वर्ष इनका विशाल मेला भरता है। ये दर्जी समुदाय के आराध्य माने जाते है। टोड़ा गांव (टोंक) में संत पीपा जी की गुफा है जिसमें वे भजन करते थे । इनसे सम्बन्धित अन्य मेले मसूरिया और गागरोण में भरते है । ये जाति पाँति, ऊंच नीच, सम्प्रदायवाद आदि के आलोचक थे। इन्होंने निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने , ईश्वर प्राप्ति हेतु गुरु की अनिवार्यता और भक्ति को मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग बताया।
ये राजस्थान में भक्ति आंदोलन की  शुरुआत करने वाले प्रथम संत थे।

(2) संत रज्जब जी :- इनका जन्म 16वी शताब्दी में जयपुर सांगानेर में हुआ। ये विवाह हेतु जा रहे थे और दादु जी के उपदेश सुनकर उनके शिष्य बन गए । जीवन भर दुल्ले के वेश में रहते हुए दादु जी के उपदेशों का बखान किया। इनके प्रमुख ग्रन्थ रज्जब वाणी , सर्वंगी आदि है। इनकी प्रमुख गद्दी सांगानेर में है वही इनका स्वर्ग वास हुआ था।

(3) संत जैमल दास जी :- ये रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रमुख संत श्री माधो दास जी दिवान के प्रमुख शिष्य थे इन्होंने सिंहथल शाखा के प्रवर्तक हरिराम दास जी से दीक्षा ली । अतः ये सिंहथल शाखा के आदि आचार्य कहे जाते है।

(4) संत रैदास जी :  ये रामानन्द जी के शिष्य थे । कुछ समय राजस्थान में रहे तथा मीरा के समय चित्तौड़ गए वहाँ इनकी छतरी चित्तौड़गढ़ के कुम्भ श्याम मन्दिर के पास कोने में है। जाति के चमार थे। इनके उपदेशो को रैदास की पर्ची के नाम से जानते हैं। इन्होंने निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का उपदेश दिया व समाज मे व्याप्त आडम्बरों और भेदभाव का विरोध किया ।

(5) गवरी बाई :- इन्हें वागड़ की मीरा भी कहा जाता है। इनका जन्म डूंगरपुर के नागर कुल में हुआ। इन्होंने वागड़ क्षेत्र में मीरा की तरह भक्ति रस की धारा को प्रवाहित किया।

(6) आचार्य भिक्षु स्वामी :- ये श्वेताम्बर जैन आचार्य थे । इनका जन्म मारवाड़ के कंटालिया गांव में विक्रम संवत 1783 में हुआ । इनके गुरु आचार्य रघुनाथ जी थे । इनसे ये 1751ई में दीक्षित हुए। इन्होंने13 साधु और 13 सामायिक करने वाले श्रावकों के साथ जैन श्वेताम्बर के तेरापंथ सम्प्रदाय की स्थापना की ।

(7) आचार्य तुलसी दास जी :- ये तेरा पंथ से सम्बन्धित नोवे आचार्य थे। इनका जन्म लाडनू में हुआ । इन्होंने अणु व्रत और इनके साथी आचार्य महाप्रज्ञ ने प्रेक्षाध्यान का सिद्धांत दिया। इनको इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार , महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन का हाकम खा सूरी पुरस्कार इत्यादि से सम्मानित किया गया है।

(8) नरहड़ के पीर :- इनका नाम हजरत शक्कर बार था। इनकी दरगाह चिड़ावा झुंझुनूं के पास नरहड़ गांव में है । पागलपन के असाध्य रोगी इनकी दरगाह पर जाने से ठीक हो जाते है। इनकी दरगाह साम्प्रदायिक सदभवना का प्रसिद्ध स्थल है यहाँ जन्माष्टमी के दिन उर्स का मेला भरता है । ये बागड़ के धणी के रूप मे जाने जाते है । शेख सलीम चिश्ती इन्ही के शिष्य थे । शेखावाटी क्षेत्र में इनकी बहुत मान्यता है।

(9) श्री प्राणनाथ जी :- ये परनामी सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। ये मूल रूप से गुजरात के रहने वाले थे। इनकी प्रमुख पीठ पन्ना मध्यप्रदेश में है। इनके उपदेश ग्रन्थ कुजलम स्वरूप में है इसकी पूजा की जाती है। इन्होंने सभी सम्प्रदायो के उच्च मूल्यों का समन्वय अपने उपदेशो में किया। जयपुर में इनका बड़ा मन्दिर है।

(10) शेख हमीदुद्दीन नागौरी :- ये राजस्थान में नागौर से सम्बंधित थे। इल्तुतमिश द्वारा दिए गए शेख उल इस्लाम के पद को इन्होंने अस्वीकार कर दिया। इन्हें ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा सुल्तान उल तरीकिन की उपाधि दी गयी। भारत मे अजमेर के बाद इनका उर्स सबसे बड़ा है। 

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