Give an account of social, religious and Economic life during the Mauryan period.

 

स्त्रियाँ अन्ध विश्वासी होती थी। अशोक ने नवम शिलालेख में कहा है कि स्त्रियाँ बहुत से क्षुद्र और निरर्थक कर्म करती थी । पर्दा प्रथा मौजूद थी, स्त्रियों को स्वतंत्रता पूर्वक विचरण नहीं करने दिया जाता था। इस तरह मौर्यकाल में स्त्रियों का कार्य क्षेत्र घर ही माना जाता था। | (5) रहन-सहन और खान-पान – भारत कृषि प्रधान देश है। लोगों का मुख्य भोजन गेहूं, जौ, चावल, फल, दूध और माँस था। अशोक के शिलालेखों से स्पष्ट होता है कि कई प्रकार के पशुओं के मांस भक्षण का निषेध किया गया था। मोर का मॉन लोकप्रिय था। अशोक द्वारा लगाई गई पाबन्दियों से मांसाहार और मदिरा सेवन में काफी कमी हो गई थी। चावल लोगों का प्रिय खाद्य पदार्थ था । साधारण लोग धातु व मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे एवं धनिक वर्ग व राजा लोग सोने चाँदी के थाल व कटोरों का प्रयोग करते थे । सुरापान भी होता था। मेगस्थनीज के अनुसार मदिरा का सेवन धन सम्पन्न राज्याधिकारियों और व्यापारियों में अधिक था। जन सामान्य में शराब इतनी प्रचलित नहीं थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उल्लेख है कि मदिरा विक्रय तथा निर्माण के ठेके दिये जाते थे एवं मदिरा पान के लिए स्थान निश्चित थे ताकि नशे में सार्वजनिक स्थानों पर वे मर्यादा का उल्लंघन न करें।

लोग अधिकांशत: सूती वस्त्र पहनते थे इसके अतिरिक्त वह ऊनी व रेशमी वस्त्रों का भी उपयोग करते थे। रंग बिरंगे परिधान तथा आभूषण पहनने का लोगों का शौक था। सम्भ्रान्त व धनी वर्ग के लोग जड़ाऊ काम किये हुए वस्त्र पहनते थे। जब वे रास्ते में चलते तो उनके दास उनके सिर पर छत्र लगाये रखते थे। इस सन्दर्भ में मेगस्थनीज का कथन मौर्य काल में लोगों के रहन सहन को निम्न प्रकार चित्रित करता है। भारतीय सौन्दर्य प्रेमी हैं। जन साधारण सूती वस्त्र पहनते थे तथा धनिक वर्ग जड़ाऊ काम के वस्त्र पहनता था जिनमें हीरे मोती जड़े होते थे तथा सोने का काम होता था। लोग सिर पर पगड़ी पहनते थे। स्त्रियों में सोने चाँदी के आभूषण धारण करने का चलन था। निर्धन स्त्रियाँ अन्य सस्ती वस्तुओं के गहने पहनती थीं।” | (6) मनोरंजन – भारतीय लोगों का जीवन नीरस नहीं था। मौर्य साम्राज्य में लोग अनेक प्रकार से अपना मनोरंजन करते थे। समाज में नट नर्तकों, गायक और वाद्य यन्त्रों को बजाने वालों की भी संख्या काफी थी। इस प्रकार नटों तथा नाटकों, वादकों एवं मदारियों द्वारा जनता का मनोरंजन होता था। मदारी हाथ के करतबों से लोगों का मनोरंजन करते थे। नाटकों में स्त्रियाँ कार्य करती थीं। राज्य तथा कुलीन लोग आखेट प्रिय थे। मेगस्थनीज ने राजा को शिकार यात्रा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब राजा शिकार पर जाता था तो उसके साथ स्त्रियाँ भी होती थीं । अशोक ने अपने शासन काल में इसे रोकने का प्रयल किया। सांडों और हाथियों की कुश्तियाँ भी मनो- विनोद के लोक प्रिय साधन थे। अशोक के अभिलेख से यह भी स्पष्ट होता है कि समाज में मल्लयुद्ध, पशुयुद्ध, दौड़, गाना बजाना, सामूहिक भोज आदि मनोरंजन के साधन थे । सामाजिक और सांस्कृतिक समारोहों में मदिरापान और नृत्यगान की भरपूर व्यवस्था की जाती थी।
(7) सदाचार और सद्व्यवहार को आदर्श – अशोक के प्रान्त अभिलेखों से ज्ञात होता । है कि लोगों में सदाचार और शुद्धाचरण की प्रवृत्ति मौजूद थी, लोग सीधे व सरल थे लोगों में कपट की भावना प्राय: नगण्य थी मिलनसार प्रकृति थी । सभी एक दूसरे के दुःख दर्द में सहानुभूति पूर्ण रवैया अपनाते थे। समाज में अपराधों की संख्या नगण्य थी। लोगों में ईमानदारी की भावना व्याप्त थी वह अपने घरों पर ताले नहीं लगाते थे। चोरों को दी जाने वाली कठोर सजाओं के डर से चोरियाँ बहुत कम होती थी।
(2) धार्मिक जीवन – मौर्य वंशीय सम्राट अशोक ने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई । अतः यद्यपि राज्य धर्म बौद्ध सिद्धान्तों पर आश्रित रहा, अन्य धार्मिक सम्प्रदायों ने भी मुक्त रूप से अपने सिद्धान्तों का प्रचार प्रसार किया। लोगों को परलोक या स्वर्ग में आस्था थी और पाप और पुण्य की अवधारणा पर विश्वास था। वैदिक धर्म का लोगों पर काफी प्रभाव था। यज्ञ आदि होते थे किन्तु अशोक ने उनमें होने वाली पशु बलि पर प्रति बंध लगा दिया। विष्णु और शिव की उपासना का प्रचलन था। देवी देवताओं की मंदिरों में स्थापना होती थी, इस काल में समाज का नेतृत्व धीरे धीरे पुरोहितों, याज्ञिकों और कर्मकाण्डियों के हाथ से निकल कर संन्यासियों और धर्म का उपदेश देने वालों के हाथ में जा रहा था ।। अहिंसा, सदाचार, पवित्र जीवनादर्श की ओर लोगों का झुकाव हो रहा था।
अशोक कालीन मुख्य समुदाय – अशोक ने अपने सप्तम स्तम्भ अभिलेख में चार सम्प्रदायों का उल्लेख किया है (1) संघ (2) ब्राह्मण (3) आजीविक (4) निग्रंथ या जैन धर्म स्तम्भ अभिलेख में यह भी उल्लेख है कि इनके अलावा समाज में अन्य सम्प्रदाय भी थे परन्तु ये मुख्य थे। इन सभी में ब्राह्मण धर्म सबसे प्राचीन था जिनकी परम्परा वैदिक थी। ब्राह्मण धर्म की सर्वोच्चता की अन्य सम्प्रदाय आलोचना के साथ साथ विरोध स्वरूप उठ रहे थे और ये सम्प्रदाय भारतीय जन जीवन को प्रभावित कर रहे थे। | (क) ब्राह्मण धर्म – मेगस्थनीज ने ब्राह्मणों के विषय में उल्लेख किया है कि ब्राह्मणों की अधिक संख्या न होते हुए भी इनका समाज में उच्च स्थान था, इन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता था। सम्राट अशोक ने भी अभिलेखों में श्रमणों एवं ब्राह्मणों का उल्लेख करते हुए श्रमणों के साथ ब्राह्मण का आदर करने एवं दान देने की अपील की है। ब्राह्मण धर्म के अनुसार श्रमण ब्राह्मण विरोधी थे । डा. प्रबोध चन्द्र बागची के कथनानुसार “तपस्वियों को सामान्य रूप से श्रमण कहा जाता था। बाद में बौद्धों ने इस पर एकाधिकार कर लिया। श्रमणों की उत्पत्ति ब्राह्मणों के ही क्रोड़ में हुई थी” ब्राह्मण धर्म में यज्ञ अनुष्ठानों का प्राधान्य था। यह कार्य पुरोहित वर्ग सम्पन्न कराता था। बौद्ध धर्म में इन्हें ब्राह्मण महाशाल कहा गया है। बौद्ध ग्रंथों में वैदिक यज्ञों के नामों का भी उल्लेख है जैसे अश्वमेघ यज्ञ, नरमेघ यज्ञ एवं वाजपेय यज्ञ आदि । मेगस्थीज ने अपने वर्णन में दो प्रकार के ब्राह्मणों का जिक्र किया है। | (i) विद्वान जो पूजा- पाठ और अध्ययन अध्यापन कार्य करते थे।
(ii) सतत लक्खन, जो सांसारिक जीवन व्यतीत करते थे। अन्धविश्वासी, अल्पज्ञानी, लोभ इनके लक्षण थे । सुत्त निपात में एक प्रसंग है कि पूर्व में ब्राह्मण तपस्वी तथा एकान्तवासी होते थे एवं सभी वस्तुओं का त्याग करने की भावना रखते थे लेकिन कालान्तर में उनमें लोभ उत्पन्न हुआ वे धन व अश्व आदि की कामना करने लगे।

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