मौर्य साम्राज्य का पतन में अशोक की भूमिका

एक ओर इस नीति से राष्ट्रीय समता और शत्रुद्वेषी भावना को शिथिल किया जो विदेशी आक्रमण को रोकने के लिए प्रबल शक्तियाँ हैं और दूसरी ओर इससे वैदिक धर्म के मानने वालों के हृदय पर जिनकी संख्या जनता में बहुत अधिक थी, अवश्य ही चोट पहुंची और यही नीति मौर्य साम्राज्य के पतन का कारण बनी।
| मौर्य साम्राज्य के पतन के कुछ सर्वमान्य कारण – मौर्य साम्राज्य के पतन के अन्य कारणों में निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे जिन पर सभी इतिहासकार एकमत हैं।
(1) अशोक के अयोग्य उत्तराधिकारी – राजतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि अयोग्य उत्तराधिकारी इसके पतन के कारण बन जाते हैं। एक विशाल साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करने के लिये योग्य उत्तराधिकारियों की आवश्यकता होती है। अशोक के उत्तराधिकारी अयोग्य थे। अशोक ने जिस मौलिक नीति का संचार राज्य में किया था उसको बनाये रखने की क्षमता उसके उत्तराधिकारियों में नहीं थी और वे शायद समझ भी नहीं पाये कि अशोक की नीति का तत्कालीन परिस्थितियों में क्या महत्त्व था। 232 ई.पू. में अशोक की मृत्यु के उपरान्त मगध के सिंहासन पर कुशाल सम्पत्ति दशरथ शालिशुक वृहद्रथ आदि कई मौर्यवंशी राजा बैठे किन्तु दशरथ और शालिशुक जैसे एक दो राजाओं ने अशोक की नीति का अनुसरण करने का प्रयत्न किया किन्तु उनमें पर्याप्त क्षमता और निष्ठा का अभाव रहा। अन्य सभी उत्तराधिकारी विलासी एवं अकुशल थे। वे न तो अशोक के पदचिन्हों पर चल सके और न ही अपनी शक्ति का परिचय दे सके । इसका परिणाम यह हुआ कि सब तरफ से सीमावर्ती राज्यों ने मिर उठाना आरम्भ कर दिया। पश्चिमी सीमान्त पर तो यूनानी राजाओं ने भारतीय प्रदेश को पद दलित कर वहाँ के शासक शोभागसेन को अपमान जनक सन्धि करने तक को मजबूर किया। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि चन्द्रगुप्त, अशोक जैसे सम्राट जब तक शासन की बागडोर संभाले रहे तब तक साम्राज्य स्थिर रहा और उसके बाद निर्बल शासकों के समय साम्राज्य छिन्न भिन्न हो गया अन्तिम सम्राट वृहद्रथ को उसके सेनापति पुष्पमित्र शुंग ने मार डाला और मौर्यवंश का अन्त हो गया।

(2) साम्राज्य का विभाजन – अशोक की मृत्यु के पश्चात मौर्य साम्राज्य के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण साम्राज्य का विभाजन था । मौर्य साम्राज्य के विभाजन की आशंकायें तो अशोक के राज्याभिषेक के समय ही उत्पन्न हो गई थी किन्तु अशोक की क्षमता से मौर्य साम्राज्य के विभाजन की आशंकायें धूमिल हो गई । लेकिन उसकी मृत्यु के पश्चात सम्पूर्ण मौर्य साम्राज्य दो भागों में बंट गया। पूर्वी भाग का शासक दशरथ व पश्चिमी भाग को शासक कुणाल बना । यह कहा जाता है कि यदि मौर्य साम्राज्य विभक्त न होता तो यूनानी आक्रान्ताओं को मुंह की खानी पड़ती । लेकिन यूनानी आक्रमण का पश्चिमी सीमान्त पर शोभागसेन अकेला ही मुकाबला करता रहा लेकिन पूर्वी भाग से इसको कोई मदद न मिली । डाथापर के मतानुसार “यदि मौर्य साम्राज्य में अशोक के बाद एकता रही होती और यदि उसके उत्तराधिकारी अशोक की नीति को चालू रखते तो भारत की भावी राजनीति के कुछ रोचक परिणाम निकल सकते थे। लेकिन परवर्ती राजाओं ने तो यह ठान ली थी कि या तो उनको सिंहासन मिले नहीं तो वे स्वयं को साम्राज्य के किसी भाग को स्वतंत्र सम्राट घोषित कर देंगे। ऐसी खींचातानी पूर्ण स्थिति में किसी भी साम्राज्य का बने रहना मुश्किल होता है।
| (3) राजतंत्रीय शासन पद्धति – राजतंत्रीय पद्धति की यह धारणा होती है कि इसकी सफलता योग्य और पराक्रमी शासकों पर आश्रित रहती है। यह जरूरी नहीं कि किसी योग्य शासक की सन्तान भी योग्य हो । मौर्यों के साथ भी यही बात लागू हुई । यदि अशोक के उत्तराधिकारी भी अशोक की तरह योग्य होते तो साम्राज्य पतन की कोई सम्भावना ही नहीं थी किन्तु उसकी सन्तान निर्बल सिद्ध हुई । राजतंत्र की यह सबसे बड़ी कमी थी।
(4) अत्यधिक केन्द्रित शासन व्यवस्था – अशोक की शासन पद्धति अत्यधिक केन्द्रित थी सम्पूर्ण शासन विभागों पर राज्य का नियंत्रण था । सम्राट अक्सर अधिकारियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क रखता था तथा राज्यपालों को राजा के आदेशों की भनक भी नहीं लगती थी, जब तक अशोक जीवित रहा उस समय तक तो इसकी प्रतिक्रिया नहीं हुई लेकिन अशोक की मृत्यु के पश्चात शासन की बागडोर उसके अयोग्य उत्तराधिकारियों ने संभाली और सत्ता केन्द्रित न रह सकी । केन्द्र की शक्ति कमजोर हो गई और शासन अस्त व्यस्त होने लगा। अर्थात् साम्राज्य विभाजित हो गया । मगध साम्राज्य के अधीन प्रदेश भी पृथक हो गये । सरकारी कर्मचारियों
की सम्राट के प्रति भक्ति का नतीजा यह निकला कि राजा के साथ उच्च अधिकारी भी बदल गये और जब सम्राट जल्दी जल्दी बदलते गये तो निश्चय ही शासन पर इसका प्रभाव पड़ा दशा और खराब होती गई।
(5) मौर्य राजाओं के अत्याचार – अशोक के उत्तराधिकारियों में से कई शासक अत्याचारी थे । उन्होंने अशोक की प्रजा से प्रेम की नीति को ठुकरा दिया। अशोक के प्रशासन को प्रान्ताधिपति, धर्म महामात्रों तथा स्वयं सम्राट की नीतियों से विवश होकर अत्याचारी नहीं बन पाते थे। उनका अंकुश उठते ही वे प्रजा पर अत्याचार करने की नीति अपनाने लगे,मौर्य सम्राट शालिशुक अत्याचारी था। उसने अपनी प्रजा को घोर पीड़ा दी । प्रजा पर अनेक प्रकार के जुल्म किये । प्रजा सम्राट और प्रान्ताधिपति दोनों के ही अत्याचारों से व्यथित हो उठी। प्रजा का असंतोष भी मौर्य साम्राज्य के पतन का एक कारण सिद्ध हुआ।
(6) प्रान्तीय शासकों के अत्याचार – प्राप्त प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि केन्द्रीय शासन से लम्बी दूरी पर नियुक्त प्रान्तीय शासकों ने अपने व्यक्तिगत हितों को पूरा करने हेतु प्रजा का शोषण आरम्भ कर दिया था। ऐसी स्थिति में यदा कदा प्रान्तीय जनता ने शासन के खिलाफ विद्रोह भी किये । बौद्ध ग्रंथों से तक्षशिला के दो विद्रोहों की जानकारी मिलती है। दोनों ही विद्रोहों का मूल कारण प्रान्तीय शासकों के अत्याचार तथा अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु प्रजा का शोषण था । अशोक के उत्तराधिकारियों को अपने प्रजा के दुःख दर्द की चिन्ता नहीं थी । प्रान्तीय शासकों के जुल्मों में वृद्धि हुई और लोगों ने निष्ठुर एवं अत्याचारी शासक से क्रुद्ध होकर साम्राज्य से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया।
(7) आर्थिक स्थिति डाँवाडोल – कुछ इतिहासकारों का मत है कि अशोक के पश्चात मौर्य साम्राज्य की आर्थिक स्थिति अति शोचनीय हो गई । इन इतिहासकारों द्वारा अशोक पर प्राय: यह आरोप लगाया जाता है कि उसने खजाने की अपार धन दान और पुरस्कार देने में खर्च कर दिया। इसी वजह से कोष खाली हो गया ।

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