मौर्य साम्राज्य का पतन और अशोक का उत्तरदायित्व ।

मौर्य साम्राज्य का पतन और अशोक का उत्तरदायित्व ।
Down fall of the Mauryan Empire and Ashoka’s responsibility

प्रश्न 29. मौर्य साम्राज्य के पतन के कारणों पर विचार कीजिए। अशोक उसके लिए कहाँ तक उतरदायी था ?
Discuss the causes of the downfall of the Mauryan empire. How far Ashoka was responsible for it ?
उत्तर – मौर्य शासन की कुल अवधि 137 वर्ष रही । मौर्य युगीन विभिन्न शासकों ने 222 ई.पू. से 184 ई.पू. तक शासन किया। इस वंश के चन्द्रगुप्त और अशौक जैसे प्रसिद्ध सम्राटों ने अपने साम्राज्य में समस्त भारत को समेट लिया और उस पर सफलतापूर्वक एक छत्र शासन किया। किन्तु अशोक की मृत्यु के पश्चात मौर्य साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया और करीब 50 साल के थोड़े समय में ही यह पूरी तरह से छिन्न भिन्न हो गया । स्वभावतः एक प्रश्न जो सोचने के लिए विवश करता है कि आखिरकार अशोक की मृत्यु के पश्चात विस्तृत एवं सुदृढ़ मौर्य साम्राज्य का इतनी जल्दी अन्त क्यों हुआ । वैसे प्रकृति के सिद्धान्त के अनुसार कोई भी शासन कोई भी राज व्यवस्था अनन्त काल तक स्थिर नहीं रह सकती । सृष्टि के विकास काल से आज तक न जाने कितनी जातियों का उत्कर्ष हुआ, कितने वंशों की नींव पड़ी और विकसित हुए किन्तु निर्दयीकाल ने उनके अस्तित्व को नष्ट कर दिया । मौर्य साम्राज्य के पतन में कोई शंका नहीं कि अशोक के उत्तराधिकारी निर्बल और अक्षम निकले लेकिन साम्राज्य के पतन के लिए अशोक को भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। क्योंकि अशोक के शासन काल में ही मौर्य साम्राज्य में कुछ ऐसी आन्तरिक कमजोरियाँ उत्पन्न हो गयीं थी जो कि मौर्य साम्राज्य की जड़ को खोखला कर रही थी और अशोक की मृत्यु के पश्चात वह सशक्त होकर इस साम्राज्य के अन्त का कारण बनी।
मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण – अशोक का उत्तरदायित्व चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने साहस और पराक्रम से जिस साम्राज्य को स्थापित किया एवं अशोक ने जिसे स्थिर बनाने का प्रयास किया एवं जिसकी प्रसिद्धि समूचे विश्व में फैलायी, वह साम्राज्य अशोक की मृत्यु के पश्चात अर्द्धशताब्दी में ही छिन्न भिन्न हो गया। विश्व में कोई भी साम्राज्य मौर्य साम्राज्य की तरह अचानक धराशायी नहीं हुआ। मौर्य साम्राज्य के पतन के लिए जो इतिहास वेत्ता अशोक को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनमें हरिप्रसाद शास्त्री प्रमुख है।
(1) डा. हरिप्रसाद शास्त्री के तर्क – डा. शास्त्री ने अशोक के कार्यों एवं नीतियों की खोजबीन की है और अशोक के प्रत्येक कार्य को मौर्य साम्राज्य के पतन का कारण माना है। डा.शास्त्री का कहना है कि अशोक ने अपने शासन काल में ब्राह्मण विरोधी नीति अपनायी जिससे ब्राह्मणों को इस नीति से ठेस पहुंची और वे मौर्य साम्राज्य के पतन के लिए दृढ़ संकल्पित हो गये । डा. शास्त्री के अनुसार अशोक की ब्राह्मण विरोधी नीति को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।
(i) अशोक ने पशु वध का निषेध कर ब्राह्मणों की जीविका में बाधा डाली थी । (i) अशोक की अहिंसावादी नीति ने ब्राह्मणों के यज्ञ आदि को प्रभावित किया। (iii) ब्राह्मणों का स्थान उच्च था अर्थात उन्हें देवता के समान स्थान प्राप्त था लेकिन | अशोक ने ब्राह्मणों को इस स्तर से गिराकर साधारण कोटि में ला दिया था। (iv) धर्म प्रचार का कार्य जो कि परम्परागत ब्राह्मणों का था । अशोक ने इस कार्य के
लिए महामात्यों की नियुक्ति की । (v) “दण्ड समता व व्यवहार समता” के सिद्धान्तों से ब्राह्मणों के उन विशेष अधिकारों
पर कुठाराघात हुआ जो परम्परा से उनको प्राप्त थे । (vi) अशोक ने जातीय ब्यवस्था को सामान्य कर ब्राह्मणों की उच्चता को आघात
| पहुंचाया था। (vii) पुराणों के अनुसार ब्राह्मण मौर्य को शूद्र समझते थे और एक शूद्र राजा ही नहीं
धर्म का भी अधिकारी बन जाय यह ब्राह्मण सहन नहीं कर सकते थे।
उपरोक्त कारणों से ब्राह्मणों में मौर्य साम्राज्य के प्रति गम्भीर प्रतिक्रिया हुई । परन्तु अशोक अपने शासन काल में इतना शक्तिशाली था कि उसके विरोध में कोई भी शक्ति अपनी आवाज बुलन्द न कर सकी परन्तु जैसे ही अशोक की मृत्यु हुई मौर्य साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर हुआ ब्राह्मणों ने प्रत्यक्ष विरोध की नीति अपनाई और इसका परिणाम यह हुआ कि अन्तिम मौर्य सम्राट वृहद्रथ को समाप्त कर ब्राह्मण वंशीय शृंगों का शासन स्थापित किया।
(2) डा.रायचौधरी द्वारा उपरोक्त तर्को का खण्डन – डा.रायचौधरी ने डा.शास्त्री के तर्को का खण्डन किया उन्होंने अपने तर्को में कहा कि डा.शास्त्री के प्रथम तर्क में कोई वजन नहीं कि अशोक ने पशुवध निषेध नीति में ब्राह्मणों को विद्रोह हेतु उकसाया। डा.चौधरी कहते हैं कि उपनिषदों तथा अन्य ब्राह्मण विद्वानों ने यज्ञों में पशु बलि की आलोचना की थी । मौर्यों को शूद्र कहना भी भ्रम पैदा करने वाली बात थी । मौर्य सम्राटों को समाज में क्षत्रिय ही माना जाता है । डा.चौधरी, डा. शास्त्री के इस तर्क के खण्डन स्वरूप कहते हैं कि अशोक ने धर्म
महामात्रों या अन्य उच्च पदों के चयन में ब्राह्मणों के लिए प्रतिबंध नहीं लगाया था । यदि ऐसा होता तो ब्राह्मण पुष्यमित्र से सेनापति कैसे बनता । अशोक द्वारा प्रचलित दण्ड समता और व्यवहार समता से विद्धानों के अनुसार ब्राह्मणों के विशेष अधिकारों पर रोक नहीं लगी बल्कि इसमें न्याय की प्रक्रिया में समता आई ताकि न्याय दाता पृथक पृथक अपनी इच्छानुसार दण्ड न दे सकें।
नीलकंठ शास्त्री ने रायचौधरी के खण्डन का समर्थन करते हुए कहा है कि कोई प्रमाण नहीं है कि अशोक में जरा भी बाहाण विरोधी भावना नहीं थी। उसने अपने शिलालेखों में श्रमणों के समान ही ब्राह्मणों को भी आदर देने की बात कही है।”
(3) . चौधरी का पत – डा चौधरी मौर्य सामाज्य के पतन का मुख्य कारण उसकी धर्म विजय की नीति को मानते हैं। उनके कथानानुसार “अजातशत्रु के समय से ही शक्ति के आधार पर मगध साम्राज्य का विस्तार हो रहा था तथा वह अशोक के काल में चरम सीमा पर पहुंच गया था। यदि इसी नीति का कड़ाई से पालन किया जाता है तो मौर्य साम्राज्य का पतन न होता।” डा.चौधरी ने अपने कथन द्वारा स्पष्ट किया कि “अशोक मात्र आदर्श से आकर्षित हुआ और उसने मेरी घोष के स्थान पर धर्म घोष, विहार यात्राओं के स्थान पर धर्म यात्राओं एवं शक्ति एवं शस्त्रों द्वारा विजय के स्थान पर धर्म विजय का नारा दिया जिससे उसके उत्तराधिकारी अपने साम्राज्य स्थापक पूर्वजों के शौर्य से विमुख हुए और मौर्य साम्राज्य का सैनिक संगठन निर्बल हो गया और वह यूनानी आक्रमण का मुकाबला न कर सका, इस तरह पुष्यमित्र शुंग के षडयन्त्र से छिन्न भिन्न हो गया।” |

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