मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए

प्रश्न 28. मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए
अथवा । मौर्य इतिहास जानने के क्या साधन हैं ? इन साधनों से मौर्य प्रशासनिक व्यवस्था पर क्या प्रकाश पड़ता है ?
What are the sources of Mauryan history ? What information do we get from these sources about the administrative system of the Mauryas ?
| उत्तर – भारतीय इतिहास में मौर्यवंश सबसे पहला वंश था जिसने देश को एक सुव्यवस्थित, सुनियोजित एक स्वच्छ शासन प्रणाली दी । मौर्य काल की शासन पद्धति की प्रामाणिक जानकारी हमें कई स्रोतों से मिली है जिसमें कौटिल्य का “अर्थशास्त्र” मेगस्थनीज की “इण्डिया” अशोक के स्तम्भ व शिलालेख, बौद्ध तथा जैन साहित्य तथा अन्य तत्कालीन साहित्यिक रचनाओं से मिलती है । मौर्य शासन पद्धति का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है –
| (1) राजतन्त्रात्मक शासन – मौर्य वंश की शासन-पद्धति राजतन्त्रात्मक थी। मगध साम्राज्य का प्रधान और समस्त शक्ति का स्रोत स्वयं सम्राट होता था। उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति, राज्य के आय-व्यय का निरीक्षण अधीनस्थ न्यायालयों की अपीलों का अन्तिम फैसला उसी के हाथ में था । राज्य की गृहनीति, परराष्ट्र नीति तथा विदेशों के साथ सन्धि अथवा युद्ध घोषणा का निर्णायक भी सम्राट ही होता था। किन्तु वह पूर्ण स्वेच्छाचारी या निरंकुश शासक नहीं होता था। कानून और धर्म उसकी स्वेच्छाचारिता पर अंकुश रखते थे।
(2) केन्द्रीय शासन – राजा को परामर्श देने वाली एक मन्त्रीपरिषद होती थी जिसके सदस्यों की नियुक्ति राजा द्वारा होती थी। इन मन्त्रियों के पास शासन के विभिन्न विभाग होते थे और वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की सहायता से अपने विभागों की व्यवस्था करते थे। उच्च पदाधिकारियों में – 1.मंत्री 2. पुरोहित 3.सेनापति 4. सन्निधाता (कोषाध्यक्ष) 5.दण्डपाल 6. दुर्गपाल और पौर (शहर कोतवालोप्रमुख थे। मन्त्री मण्डल में 12 से 18 तक मन्त्री होते थे। चाणक्य ने 18 अमात्यों या मन्त्रियों का उल्लेख किया है। उस समय राज्य के सात प्रमुख अंग माने जाते थे – (1) राजा (2) अमात्य (3) दुर्ग (4) जनपद 5) सेना (6) कोष तथा (7) मित्र ।
| (3) प्रान्तीय शासन – मौर्य साम्राज्य की सीमाएँ सौराष्ट्र से लेकर बंगाल और हिन्दू कुश से लेकर नर्मदा के नीचे दक्षिण तक फैल गई थीं इसलिए शासन की सुविधा के लिए मौर्य शासकों ने अपने अधिकृत विशाल साम्राज्य को प्रान्तों में विभाजित कर दिया था।
1.उत्तरापथ – कम्बोज, गांधार, काश्मीर, अफगानिस्तान, पंजाब आदि प्रदेश । 2. पश्चिमी भाग – काठियावाड़, सौराष्ट्र, राजपूताना, मालवा ।। 3. दक्षिण पथ- विंध्याचल से दक्षिण का सारा भाग। 4. कलिंग – अशोक द्वारा विजित प्रान्त । 5 मध्य देश- बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, आदि ।।
इन प्रान्तों की क्रमशः पाटलिपुत्र, तोसाली, उज्जयिनी, तक्षशिला और सुवर्णगिरि वानिया थी। इन पाँचों प्रान्तों में एक एक वायसराय जैसा शासक रहता था जो अधिकतर पुत्र अथवा राजकुल का ही कोई व्यक्ति होता था। इन प्रान्तों के अन्तर्गत विभिन्न उपप्रान्त जिनमें महामात्य का शासन था। इन महामात्यों को पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे मध्य देश का शासन जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी स्वयं सम्राट की शासन व्यवस्था में रहता था।
ये 5 विभाग मण्डलों में विभक्त थे। बहुत से जन पदों का एक मण्डल बनता था कि एक जनपद के अन्तर्गत बहुत से ग्राम होते थे ।
| (4) नगर शासन – मौर्य कालीन शासन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि सम्राट नै नगरों और ग्रामों को स्वायत्त शासन प्रदान कर रखा था। वर्तमान काल की तरह स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ मौजूद थीं जिनमें ग्राम सभायें और नगर सभायें प्रमुख थी । पाटलिपुत्र, तक्षशिला, उज्जयिनी आदि में नगर का शासन प्रबन्ध एक नगर सभा द्वारा होता था जिसमें 6 उप-समितियाँ होती थीं और प्रत्येक समिति में 5-5 सदस्य होते थे । ये उप समितियाँ थी – (i) औद्योगिक शिल्प कला समिति – यह नगर में होने वाले उद्योग धन्धों और शिल्प
कला का प्रबन्ध करती थी । अनेक उद्योगों में लगे हुए श्रमिकों को पारिश्रमिक निश्चित करना, श्रमिकों की देख-रेख, उद्योग केन्द्रों में अच्छी कोटि का माल
पहुंचाना आदि इसके प्रमुख कार्य थे। (i) वैदेशिक समिति – यह उपसमिति विदेशियों का आदर सत्कार और उनके
आवागमन की देख रेख करती थी। उनकी उचित निवास, सुरक्षा और सेवा सुश्रुषा
का सारा प्रबन्ध इसके हाथ में था। (iii) वाणिज्य-व्यापार समिति – व्यापारिक मामलों का निपटारा इसी उप समिति के हाथ
में था। भार और तौल की जाँच करने का कार्य इसी के कार्य क्षेत्र में था । बाजारों में शुद्ध माल का निर्यात और व्यापारियों की सुविधा के लिये किए गये कार्यों का संभार इसी पर था।
(iv) जन गणना समिति – जन गणना का कार्य करती थी । राज्य में पैदा होने वालों और
मरने वालों की जानकारी उपलब्ध करना और उनको रजिस्टर में अंकित करना
इसका कार्य क्षेत्र था। (v) वस्तु निरीक्षक समिति – यह समिति उन व्यापारी व विक्रेताओं पर कड़ी दृष्टि रखती
थी जो शुद्ध माल में नकली या पुराना माल मिलाकर ग्राहकों को ठगने का प्रयास
करते थे। (vi) कर समिति – यह समिति क्रय-विक्रय पर कर वसूल करती थी।
इस प्रकार नगर सभायें लगभग वह सभी कार्य किया करती थी जो आज कल म्यूनिसीपेल्टियाँ किया करती हैं । सार्वजनिक भवनों की देखरेख, उनकी मरम्मत, मंदिर तालाबों की व्यवस्था, जन-मार्गों का निरीक्षण आदि नगर सभाओं का ही काम था।
| (5) ग्राम सभाओं – गाँवों में ग्राम सभायें होती थी जिनका मुख्य व्यवस्थापक ग्रामिक” होता था । वह गांव के वयोवृद्धों की सहायता से ग्रामीणों के झगड़े निपटाता था। उसका पद अवैतनिक होता था और उसका चुनाव ग्रामीण ही करते थे, ग्रामिक से बड़ा “गोप” होता था जिसके अधीन 10 गांव होते थे। “स्थानीय” नामक अधिकारी “जनपद” की व्यवस्था करता था। ग्राम सभाओं के अतिरिक्त मौर्य काल में व्यावसायी संघ (Guilds) भी होते थे । यद्यपि आंतरिक व्यवस्था में ये स्वतन्त्र थे किन्तु इनकी रीति-नीति पर शासन की ओर से नियन्त्रण रहता था।
(6) न्याय व्यवस्था – मगध साम्राज्य में अनेक न्यायालय थे । सबसे छोटा न्यायालय ग्राम संघ” होता था जिसमें गाँव के छोटे-छोटे झगड़ों का निपटारा किया जाता था। उनका न्यायिक अधिकारी “राजुक” कहलाता था । दस ग्रामिणों का न्यायालय संग्रहण, चार सौ ग्राम के न्यायालय द्रोणमुख तथा 800 गांवों का न्यायालय “स्थानीय” कहलाते थे । न्याय का सबसे बड़ा स्रोत सम्राट था जिसके यहाँ उच्चतम न्यायालयों की अपील की जाती थी। समस्त न्यायालय दो भागों में विभक्त थे (1) धर्मस्थीय और (2) कंटक शोधन । दीवानी मामलों में हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुशासनों के आधार पर फैसले दिये जाते थे। फौजदारी कानून बड़े कठोर थे । मामूली अपराधों के लिए भी अंग भंग या मृत्यु दण्ड की व्यवस्था थी इसलिए मौर्य काल में अपराधों की संख्या बहुत कम थी। घरों में ताले लगाने की प्रथा नहीं थी। | (7) सैन्य संगठन – सेना का नियंत्रण एक स्वतंत्र युद्ध विभाग द्वारा होता था जिसमें 30 सदस्य थे । विभाग में 6 समितियाँ थीं जिनमें 5-5 सदस्य होते थे। ये समितियाँ निम्नांकित
थीं ।

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