मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं

(i) नौ सेना समिति (ii) सेना में प्रयुक्त होने वाले सामान को ढोने वाली गाड़ियों का प्रबन्ध करने वाली
समिति । इसकी देख रेख के अन्तर्गत ढोल बजाने वाले, सईस, मशीन का काम
करने वाले मिस्त्री और घास खोदने वाले थे। (ii) पदाति समिति पैदल सैनिकों की व्यवस्था करने वाली । (iv) अश्वारोही समिति (v) रथ समिति (vi) गज-समिति
| सेना का नियन्त्रण “सेनापति” के हाथ में था जिसकी नियुक्ति राजा किया करता था । सेना स्थायी थी और सैनिकों को नगद वेतन दिया जाता था। राज्य में दुर्गों का अत्यन्त महत्त्व था । पाँच प्रकार के दुर्गों का उल्लेख मिलता है – (क) स्थल दुर्ग; (ख) जल दुर्ग, (ग) मरु दुर्ग, (घ) गिरि दुर्ग तथा (ङ) वन दुर्ग । मौर्य शासन में मगध साम्राज्य का एक जहाजी बेड़ा भी था।
| (8) भूमि प्रबन्ध – मौर्य कालीन राजस्व व्यवस्था भी प्रौढ़ावस्था में थी। जमीन की पैमाइश होती थी और उसकी किस्म के अनुसार ही भूमि कर निर्धारित किया जाता था । उपज का 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाता था किन्तु अनावृष्टि या अतिवृष्टि के कारण फसल नष्ट होने पर 1/8 भाग ही लगान के रूप में वसूला जाता था । किसानों को कृषि के लिए
आर्थिक सहारता दी जाती थी और सिंचाई का उचित प्रबन्ध किया जाता था । नहरों का निर्माण प्रति वर्ष होता था अ सी जमीन जोतने- बोने योग्य बनाली गई थी। किसानों से सिंचाई कर वसूल किया जाता ।
(9) गुप्तचर विभाग – मौर्य काल में विशेष कर चन्द्रगुप्त के राजत्व काल में एक सुसंगठित गुप्तचर विभाग था। राज्य की ओर से बहुत बड़ी संख्या में गुप्तचर नियुक्त किये गये थे। ये अधिकारियों, विदेशी यात्रियों और असामाजिक तत्वों की गुप्त बातों और षडयन्त्रों की सूचना राजा तक पहुंचाते थे । ये गुप्त भाषा और लिपि का प्रयोग करते थे। इतने विशाल साम्राज्य में कानून व्यवस्था और शान्ति बनाये रखने में गुप्तचर विभाग की अहम् भूमिका थी।
| (10) सड़कें – मौर्य प्रशासकों ने अनेक नई सड़कों का निर्माण करवाया और उनके दोनों और यात्रियों की सुविधा के लिए छायादार वृक्ष लगवाये । पाटलिपुत्र से तक्षशिला आदि बड़े-बड़े नगरों को सड़कें जाती थी और नियमित रूप से प्रतिवर्ष इनकी मरम्मत का कार्य होता था। सड़कों की व्यवस्था के लिए एक अलग ही विभाग था।
| (11) स्वास्थ्य -जन स्वास्थ्य की विशेष देखभाल की जाती थी । खाद्य पदार्थ में मिलावट करने वालों को कड़ी से कड़ी सजायें दी जाती थीं । चन्द्रगुप्त और अशोक दोनों ने अनेक चिकित्सालयों की स्थापना की जिनमें औषधि निर्माण शालाओं से बनकर औषधियाँ आती थी। नगरों की सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता था। अशोक प्रियदर्शी ने तो पशुओं तक के लिए कई चिकित्सालयों की स्थापना की थी।
(12) अशोक द्वारा शासन नीति में परिवर्तन – अशोक महान ने चंद्रगुप्त की शासन व्यवस्था में अनेक नये सुधार किये। उसने धर्म महामात्रों और रज्जुकों की नियुक्ति की जो प्रजा के नैतिक स्तर को उठाने और उसमें सदाचार का प्रचार करने के लिए रखे गये थे। उसने चन्द्रगुप्त की साम्राज्यवादी नीति के स्थान पर विश्व बन्धुत्व की नीति काम में ली और युद्ध सदैव के लिए समाप्त कर दिये । उसने प्रजा के साथ अपने पुत्रों के समान व्यवहार किया।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि मौर्यों की शासन पद्धति अपनी बहुत विशेषताओं के कारण क्यों इतना महत्त्व रखती है। मौर्य वंश के शासन से भारतीय इतिहास का एक नया युग प्रारम्भ होता है । मौर्य काल में भारत में राजनैतिक एकता का श्रीगणेश हुआ ।
छोटी छोटी रियासतों की स्वतन्त्र सत्ता समाप्त हो गई और मौर्य साम्राज्य में उनका विलीनीकरण हो गया। इस वंश की अवधि में भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रचार हुआ
और भारतीय धर्म का प्रभाव विस्तार भी बढ़ा । मौर्यों के शासन काल में भारत में सुख शांति रही । बाह्य आक्रमणों और आन्तरिक विद्रोहों को दबाने में वे पूर्ण सफल रहे। एक छत्र सार्वभौमिकता इस युग की प्रमुख विशेषता थी।

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