मौर्य कालीन सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक जीवन पर प्रकाश – डालिये?

प्रश्न 30. मौर्य कालीन सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक जीवन पर प्रकाश – डालिये?
उत्तर – मौर्य वंश के सम्राटों के शासन में प्रजा को सुख शान्ति और सुरक्षा मिली इस कारण सामाजिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए जिन्होंने लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में मदद दी । मौर्य कालीन सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक दशा पर मेगस्थनीज की इण्डिका, चाणक्य का अर्थशास्त्र एवं अशोक के अभिलेख पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। इस क्षेत्र में हमारी जानकारी के मूल स्रोत हैं।
1. सामाजिक दशा (Social Condition) (1) वर्ण एवं जाति – मौर्य शासन में समाज का विभाजन वैदिक कालीन वर्ण व्यवस्था के अनुसार था । कार्य विभाजन के आधार पर समाज को चार भागों में विभक्त कर दिया गया था। समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि था । वे आदर और सम्मान के पात्र समझे जाते थे उसके बाद क्षत्रिय थे जिनका प्रभाव भी कम नहीं था । शासक वर्ग तथा सैन्य संगठन में अपने बाहुल्य के कारण वे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते थे । वैश्य व्यापारी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था । वाणिज्य व्यापार उनके हाथ में था। शूद्रों की दशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ उनकी स्थिति शोचनीय ही बनी रही । आरम्भ में इसमें कट्टरता नहीं थी । एक वर्ण से दूसरे वर्ण में परिवर्तन सम्भव था। कालान्तर में इसने जाति प्रथा अर्थात जन्म के आधार पर विभाजन का रूप ले लिया और इसमें क्लिष्टता आ गई। जैन और बौद्ध धर्म ने जाति प्रथा को झकझोर दिया । जातियों में जहाँ पहले ब्राह्मणों को उच्च स्थान दिया गया। अब क्षत्रियों को ब्राह्मणों से ऊंचा स्थान दिया गया। इसका प्रभाव ब्राह्मणों पर पड़ा। वे अपनी पूर्व स्थिति को प्राप्त करने में जुट गये और मौर्यकाल तक आते आते ऐसा लगता है कि ब्राह्मणों का बोलबाला शुरू हो गया । कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में ब्राह्मणों के अधिकारों और सुविधाओं का वर्णन अग्र प्रकार किया।
(i) ब्राह्मण को मृत्यु दण्ड नहीं दिया जा सकता था। (ii) ब्राह्मण से बेगार नहीं करायी जा सकती थी। (ii) जिस मार्ग से ब्राह्मण जा रहा हो उस मार्ग में शूद्र नहीं जा सकता था ।
कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में पुरोहित का बहुत सामाजिक और राजनीतिक महत्त्व बताते हुए कहा कि पुरोहित के परामर्श से कार्य करना राजा का धर्म था। मेगस्थनीज ने इस काल के समाज का विभाजन सात भागों में किया है – (1) दार्शनिक (2) कृषक (3) योद्धा (4) चरवाहे (5) कारीगर (6) दण्डनायक (7) परामर्शदाता ।।
। मेगस्थनीज का जाति विषयक यह वर्णन भ्रमपूर्ण है उसने जातियों का वर्णन न कर व्यवसायों का वर्णन किया है। विदेशी होने के कारण वह भारतीय वर्ण व्यवस्था से अवगत नहीं था।
(2) आश्रम व्यवस्था – वैदिक काल में जीवन चार भागों में विभक्त था, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास जीवन के इन चारों कालों को वर्षों में विभाजित कर रखा था। जीवन के प्रथम 25 वर्ष गुरुकुलों में विद्याध्ययन एवं ब्रह्मचर्य पालन के लिए थे। 25 से 50 वर्ष की आयु तक गृहस्थ जीवन का पालन होता था। 50 से 75 वर्ष का जीवन काल वानप्रस्थ या त्याग तपस्या का समय था। जब पति एवं पली दोनों ही अपनी सन्तान पर सब कुछ छोड़कर वनों में त्याग तपस्या का जीवन व्यतीत करते थे। शेष जीवन काल के 25 वर्षों में अर्थात 75 से 100 वर्ष तक स्रुंन्यासी बनकर प्रवज्या करते थे और समाज को धर्म के रास्ते पर चलने हेतु प्रेरित करते थे। इस प्रकार भारतीय समाज का मुख्य आधार आश्रम व्यवस्था थी। जैन और बौद्ध धर्म के प्रभाव से अब इन चारों आश्रमों का विधिवत पालन नहीं होता था और शुरू से ही भिक्षु जीवन को प्रोत्साहन दिया जाता था । ब्रह्मचर्य आश्रम का समय भी बढ़कर 35 या 37 वर्ष हो गया था। मौर्यकाल में अधिकांश ब्राह्मण कहलाने वाले वर्ग भी वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम का विधिवत पालन नहीं करते थे।
(3) दास प्रथा – मौर्यकाल में दास प्रथा भी थी, सम्पन्न लोग अपने घरों में दास रखते थे। मेगस्थनीज का यह कथन कि “भारत में दास नहीं होते थे। सभी भारतीय स्वतंत्र थे। वे विदेशियों को भी दास नहीं बनाते थे।” तथ्यों से परे है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दासों का वर्णन है । दास प्रायः निम्न जाति के होते थे। युद्ध में बन्दी बनाये गये लोगों को भी प्रायः दास बनाकर रखा जाता था। किन्तु अन्य देशों की तरह इन दासों पर अत्याचार नहीं होता था। वे परिवार के ही अंग समझे जाते थे और उन्हें दया दृष्टि से देखा जाता था उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाता था। भारत में दासों को सम्पत्ति तक के अधिकार मिल जाते थे। यहाँ दासों की स्थिति हैलेटो जैसी नहीं थी। अशोक ने अपने अभिलेखों में दासों का जिक्र किया है। बौद्ध ग्रन्थों के अन्तर्गत तीन प्रकार के दासों का विवेचन है –
(i) पैतृक जो पीढ़ी दर पीढ़ी दास चले आते थे। (ii) खरीदे हुए या उपहार में प्राप्त दास ।। (iii) घर में उत्पन्न दास ।। अर्थशास्त्र के अनुसार आर्यों को दास नहीं बनाया जा सकता था।
(4) स्त्रियों की दशा – ऋग्वैदिक काल की तरह मौर्य काल में अधिक स्वतंत्रता नहीं थी फिर भी समाज में उनका आदर होता था और उन्हें परिवार का एक मुख्य अंग माना जाता था। स्त्रियों को विधवा विवाह, सम्बन्ध विच्छेद की अनुमति थी । मेगस्थनीज का कथन है कि विवाह अपनी जाति में ही हो सकते थे, किन्तु अर्थशास्त्र में अन्तर्जातीय विवाहों का उल्लेख है। उच्च जातियों में विवाह अधिकांशतः सजातीय ही होते थे। समाज में तलाक की प्रथा भी चालू थी यद्यपि इसकी सीमित तथा विशेष परिस्थितियों में ही अनुमति मिलती थी । कौटिल्य ने उन स्थितियों का उल्लेख किया है कि जब पति-पत्नी दोनों ही यदि सम्बन्ध विच्छेद चाहते हों, या
पति बहुत समय तक बाहर रहे और पत्नी के भरण पोषण की व्यवस्था न करे या वह विकलांग | या शारीरिक दृष्टि से अयोग्य हो तो सम्बन्ध विच्छेद हो सकता था। स्त्री के व्यभिचारिणी होने
पर पति तलाक दे सकता था। विधवा विवाह श्वसुर की अनुमति से ही हो सकते थे यदि किसी स्त्री के बच्चा होता था तो उसे एक वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी । दहेज की वस्तुओं व गहनों पर स्त्री का ही अधिकार होता था । मौर्य शासन में बहु विवाह की प्रथा थी। धनाढ्य लोग अपनी स्त्री के अलावा “रखैल” रखते थे । मेगस्थनीज लिखता है कि पत्नियों का मुख्य काम सन्तान उत्पन्न करना था। कुछ पति की सेवा के लिए होती थी। बौद्धों में सन्तानोत्पत्ति स्त्री के लिए आवश्यक नहीं थी । वे भिक्षुणी बनकर धर्म कार्य में लग जाती थी । मेगस्थनीज के अनुसार पत्नियाँ व्यभिचारिणी होती थीं। एक हाथी की भेंट के बदले चरित्रवान से चरित्रवान स्त्री भ्रष्ट हो सकती थी । कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी परोक्ष रूप से इसकी पुष्टि करता है।

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