अशोक ने “धम्म” तथा बुद्ध के धार्मिक सिद्धांतों का स्वदेश और विदेशों | में प्रसार करने के लिए क्या-क्या उपाय किये ?

प्रश्न 26. अशोक ने “धम्म” तथा बुद्ध के धार्मिक सिद्धांतों का स्वदेश और विदेशों | में प्रसार करने के लिए क्या-क्या उपाय किये ?
What measures were adopted by Ashoka for the spread of Dhamma and Buddhistic doctrines in his own country and abroad.
अथवा
अशोक केवल भारत का ही नहीं विश्व का महालय पर शा। इस कार को लवेक्षण कोजिए।
Ashoka was one of the greatest emperor not only of India but of the world”. Discuss
शारतीय इतिहास में अशोक के यहत का मूल्यांकन कीजिए। Estimate the importance of Ashoka in Indian History.
उत्तर अशोक को बौद्ध धर्म में असीम श्रद्धा और आस्था थी। उसने स्वयं बौद्ध धर्म ३ दीक्षा ली और उसके सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करने के लिए अनेक उपाय काम में लिए जिनमें से प्रमुख निम्न थे
1. व्यक्तिगत आचरण – अशोक ने बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को अपने ऊपर लागू किया और उनके अनुसार आचरण से लोगों के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया। उसने अपने प्रासाद में भास भदिरा के सेवन पर पाबन्दी लगा दी। राजकीय भोज समारोहों अथवा दैनिक भोजन के लिए जो पशु वध होता था वह बंद करवा दिया। उसने शाही वस्त्र आभूषण त्याग दिये और भिक्षुओं जैसे कोषेचे वस्त्र धारण करना प्रारम्भ कर दिया। लोक कल्याण में उसने अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया।
2. बोद्ध धर्म को राजधर्म घोषित किया – दूसरा उपाय जो उसने धर्म प्रचार में इस्तेमाल किया वह था कि उसने बौद्ध धर्म को राज्य धर्म घोषित कर दिया इससे उसकी प्रजा को भी बौद्ध धर्म ग्रहण करने की प्रेरणा मिली । उसने हजारों स्तूपों का निर्माण करवाया और बौद्ध गया, लुम्बिनी और श्रावस्ती आदि बौद्ध तीर्थ स्थानों की यात्रा को । ।
। ३. ध महाभात्रों की नियुक्ति – अशोक ने अलग से एक धर्म विभाग खोला जिसका संचालन महामात्रों द्वारा होता था धर्म महामात्रों का कार्य यह भी था कि वे लोगों में नैतिक भावनाओं को उत्पन्न कर उन्हें सदाचारी बनाने की प्रेरणा देते थे। वे यह भी देखते थे कि लोग अशोक के देशों का पालन करते हैं या नहीं। धर्म महामात्रों को नियुक्ति प्रजा के भौतिक और नैतिक विकास के लिए की गई थी।
। 4. शिलालेखों और प्रस्तर स्तम्भों की स्थापना – अशोक ने साम्राज्य के विभिन्न प्रान्त में प्रमुख स्थानों पर प्रस्तर और स्तम्भों पर बौद्ध धर्म के मुख्य-मुख्य सिद्धान्तों तथा उपदेशों को उत्की करवाया । पुरातत्त्व विभाग को अशोक के ऐसे स्ल और शिलालेख देश के अनेक राज्यों में प्राप्त हुए हैं। इनकी स्थापना का उद्देश्य धर्म के सिद्धांतों को जनता के मध्य | पहुंचाना था।
5. लोक भाषा का प्रयोग – अशोक ने धर्मोपदेशकों की नियुक्ति कर विभिन्न प्रांतों में भेजा । उन्हें आदेश दिया कि वे अपने उपदेश प्रांत विशेष की लोक भाषा में ही दें। इसके अतिरिक्त स्तम्भों और शिलाओं पर भी जो लेख उत्कीर्ण करवाये वे पाली, राष्ट्रीय या ब्राह्मी में लिपिबद्ध थे । सीमा प्रांत में मिले स्तम्भों का आलेख खरोष्ठी में है तो मैसूर कलिंग, गया, नेपाल आदि के ब्राह्मी लिपि में । जनाधारण की भाषा में प्रचार करने से बौद्ध धर्म लोकप्रिय हो गया।
6. धार्मिक संगोष्ठियाँ – अशोक ने वार्षिक यात्राओं का प्रोग्राम बनाया और बुद्ध के प्रमुख तीर्थस्थलों, जैसे -सारनाथ, श्रावस्ती, कुशीनगर आया-जाया करता था । वह अनेक बौद्ध भिक्षुओं और विद्वानों की संगोष्टियाँ आयोजित करता था। हजारों लाखों लोग इन गोष्ठियों में भाग लेते थे और बुद्ध के उपदेशों को सुनते थे ।
7. विदेशों में धर्म प्रचार – अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए श्रीलंका ब्रह्मदेश, कश्मीर, गांधार, पश्चिमोत्तर प्रदेशों में अनेक धर्म प्रचारकों को भेजा। श्री लंका में उसने अपने पुत्र महेन्द्र और अपनी पुत्री संघमित्रा को प्रचार के लिए भेजा । उनके प्रयास से श्री लंका के राजा ने बौद्ध धर्म को ग्रहण कर लिया। पश्चिम के देशों जैसे – मिस्त्र, सीरिया, यूनान आदि में भी कई बौद्ध आचार्य और भिक्षुओं ने जाकर बुद्ध के धर्म सिद्धान्तों का प्रचार किया। अशोक का यह विदेशी धर्म प्रचार अभियान काफी सफल रहा। इसी का परिणाम है। कि भारत में चाहे बुद्ध धर्म लुप्त प्रायः हो गया । किन्तु विदशों में आज भी बौद्ध अनुयायियों की काफी बड़ी संख्या मौजूद है।
8. बौद्ध धर्म की तीसरी सभा का आयोजन – अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में बौद्ध धर्म की तीसरी सभा का आयोजन किया । इसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्र तिस्स ने की। बौद्ध धर्म में इस समय आंतरिक सूट का बोलबाला था। यह धर्म कई सम्प्रदायों में बंट गया। था । इस सभा का उद्देश्य इन सम्प्रदायों में समन्वय स्थापित करना और भिक्षुओं को एक मंच पर संगठित करना था। इस सभा में सहस्रों बौद्धानुयायियों ने भाग लिया और बुद्ध के धर्म में प्रविष्ट हुई बुराइयों पर विचार-विमर्श कर उनके निराकरण के उपाय सोचे गये । ।
9. धर्माडम्बरों की रोकथाम – समाज में अनेक कुरीतियाँ उत्पन्न हो गई थीं। अब भी हिंसात्मक यज्ञ और अनुष्ठान होते थे। विवाहादि अवसरों पर अपव्यय किया जाता था। लोगों को जादू-टोनों पर विश्वास था । निरर्थक कर्मकाण्ड धार्मिक कृत्य किये जाते थे। अशोक ने इन सब पर पाबन्दी और महामात्यों द्वारा लोगों को समझाया कि सदाचार और सत्याचरण ही
असली धर्म का अंग है। धार्मिक आडम्बरों में कुछ नहीं रखा है। इस सब का धर्म प्रचार के तीव्र बनने पर काफी प्रभाव पड़ा।
| इस कथन में जरा सा भी संशय नहीं है कि अशोक केवल भारत का ही नहीं वरन् । विश्व का एक महानतम सम्राट था। विश्व में अनेक विख्यात सम्राट हुए हैं जो अपनी सामरिक | विजयों और प्रशासनिक उपलब्धियों के लिए इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं, किन्तु अपने मानवीय आदर्शों और प्रजावत्सलता के कारण अशोक उन सब में दैदीयप्यमान सूरज की भाँति प्रकाशित है।

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