अशोक के स्तम्भों एवं शिलालेखों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उनसे Tस सम्बन्धी क्या जानकारी मिलती है ?

प्रश्न 27. अशोक के स्तम्भों एवं शिलालेखों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उनसे Tस सम्बन्धी क्या जानकारी मिलती है ?
Give a short account of the pillar and rock edicts of Ashoka. historical information do they afford.
अथवा
अशोक के अभिलेखों पर टिप्पणी लिखिए। Write a note on Ashok’s edict.
उतर – अशोक के राज्य काल की अधिकतर ऐतिहासिक सामग्री उसके स्तम्भों और शिलालेखों से उपलब्ध हुई है जिन्हें उसने अपने साम्राज्य के सीमांत प्रदेशों और विभिन्न प्रांतों में स्थापित करवाया था। इनकी स्थापना में अशोक का उद्देश्य अपनी कीर्ति पताका फहराना नहीं था । इतिहास में अन्य सम्राटों द्वारा स्तम्भों का निर्माण कराये जाने का उल्लेख मिलता है। किन्तु उनके ये स्तम्भ या तो उनकी सामरिक विजयों के उपलक्ष में बने थे या उनकी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति में । अशोक के शिलालेखों की विशेषता इसमें है कि उनकी स्थापना का उद्देश्य धर्म प्रचार था ।
स्तम्भों का शिल्प सौष्ठव – शिल्प कला की दृष्टि से अशोक के स्तम्भ अत्यन्त आकर्षक और कलात्मक हैं। इनकी अधिकतम ऊंचाई 50 फुट और कम से कम 35 फुट है। तथा इनमें से कइयों का वजन 50 टन तक का है । स्तम्भों के शीर्ष पर सिंह, हाथी और बैल की सुन्दर प्रतिमाएँ हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इनके निर्माण में इन्डो ग्रीक शैली का प्रयोग किया गया । उस समय भारत का यूनानी राज्यों से सम्पर्क था । यही नहीं अशोक ने अनेक यूनानी प्रान्तों के साथ दौत्य सम्बन्ध कायम किये थे। इसलिए यूनानी कला का प्रभाव पड़ना असम्भव नहीं था । प्रस्तर स्तम्भ बड़े चिकने- चमकीले हैं। विशेषज्ञों का कथन है कि इनमें चुनार पर्वत का कठोर और निर्दोष पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। हजारों मील दूरी से इतने भारी ये प्रस्तर ढोकर कैसे लाए गए होंगे, आश्चर्य में भर देने वाली बात है।
शिला लेख – अशोक के ये अभिलेख ऐतिहासिक दृष्टिकोण से आठ श्रेणियों में विभाजित किये जा सकते हैं। (i) लघु शिला लेख – ये शिला लेख मैसूर राज्य के अन्तर्गत सिद्धपुर, जतिंग, रामेश्वर
और ब्रह्मगिरि में; जबलपुर जिले के रूपनाथ में और जयपुर के निकट बैराठ जैसे
प्राचीन नगरों में मिले हैं। (ii) अबू शिलालेख – यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शिलालेख है जो जयपुर राज्य के
अन्तर्गत बैराठ नगर से प्राप्त हुआ है। (iii) चौदह शिला लेख – ये सीमा प्रान्त के पेशावर व हजारों जिलों में मिले हैं। इसमें
अफगानिस्तान में स्थित लमजान का शिलालेख तथा कन्धार से प्राप्त यूनानी भाषा में लिखा शिलालेख उल्लेखनीय है। देहरादून और हैदराबाद में मिलने वाले
अभिलेख पर्वतीय चट्टानों पर अंकित हैं। (iv) कलिंग लेख – ये दोनों अभिलेख धौली और जोगड़ नामक स्थानों पर मिले हैं। (v) बाराबर के गुफा लेख – गया जिले में राजगिरि के निकट बाराबर की पहाड़ियों में
(vi) तराई के स्तम्भ लेख – नेपाल स्थित रूम्मनदेई और निम्लवा गाँवों में मिले हैं। (vii) सात स्तम्भ लेख – ये क्रमशः टोपरा मेरठ, कोशाम्बी, लौरीय अरराज, लोरिया
नन्दगढ़ और चंपारन जिले में मिले ।
(viii) चार स्तम्भ – सांची. सारनाथ, कौशाम्बी और इलाहाबाद में मिले हैं। इनके अलावा
सहसराम, गुजरात, मास्की, पालकि, गुण्ड, राजुला, अहौना, दिल्ली, तोपरा आदि में भी कई लघु शिलालेख उपलब्ध हुए हैं।
| अभिलेखों का ऐतिहासिक महत्त्व (1) अशोक के साम्राज्य की सीमाओं की जानकारी – इन अभिलेखों से यह ज्ञात होता है कि अशोक के राज्य काल में मौर्य साम्राज्य का कितना विस्तार था और उसमें कौन यौन से प्रान्त सम्मिलित थे । पश्चिमोत्तर सीमा पर मिले अभिलेख प्रकट करते हैं कि अफगानिस्तान और कश्मीर उसके राज्य के अंग थे। केवल दक्षिण के केरल, चोल, सत्यपुत्र और पांड्य राज्यों को छोड़कर समस्त भारत उसके आधिपत्य में था । पूर्व में उड़ीसा से लेकर पश्चिम से सौराष्ट्र और उत्तर में नेपाल से लेकर दक्षिण में मैसूर की सीमा तक अशोक का अखण्ड शासन था। | (2) अशोक की शासकीय नीतियों का ज्ञान – ये प्रस्तर-अभिलेख बताते हैं कि अशोक के धर्म का स्वरूप कैसा था । उनसे ज्ञात होता है कि धार्मिक नीति सहिष्णुता पर आश्रित थी । उनका लक्ष्य प्रजा को नैतिकता और सदाचार के पथ पर अग्रसर करना था। उनसे अशोक की प्रजा-वत्सलता और लोक सेवा के प्रति उसके समर्पित जीवन का भी पता लगता
| (3) राज्याधिकारियों का ज्ञान – ये अभिलेख इस बात की जानकारी भी देते हैं कि महामात्र, प्रतिवेदक, धर्ममहामात्रों के क्या क्या दायित्व थे और शासन व्यवस्था में उनकी क्या स्थिति थी । बहुत से अभिलेखों में “राजु” और धर्म महामात्रों के लिए आदेश हैं कि उन्हें क्या क्या करना चाहिए । | (4) तत्कालीन वास्तुकला की जानकारी – अशोक के स्तम्भों को देखकर मौर्यकालीन वास्तुकला की प्रगति का भी ज्ञान होता है। ये स्तम्भ इतने चिकने, सुदृढ़ और आकर्षक है कि उस समय के शिल्पकारों की बरबस ही प्रशंसा करनी पड़ती है। इनकी विशालता, भार और इन पर बनी मूर्तियों की तक्षण कला उच्चकोटि की है।
(5) सामाजिक दशा का ज्ञान – ये अभिलेख हमें उस समय की सामाजिक दशा की जानकारी देते हैं। इनको पढ़कर हमें ज्ञात होता है कि मौर्यकाल में पशुवध होता था, यज्ञों में पशु-बलि दी जाती थी और लोग माँस-मदिरा का प्रयोग करते थे। वैदिक हिन्दू धर्म का कर्मकाण्डीय क्रिया-कलाप प्रचलित था। ब्राह्मण धर्म की क्लिष्टतायें मौजूद थीं। अशोक ने हिंसात्मक धार्मिक कृत्य, पशुबलि, माँस सेवन, मदिरा सेवन निषिद्ध कर दिया था। इनसे दास प्रथा के अस्तित्व, विदेशी व्यापार और स्थलीय और जलीय यात्राओं के होने का भी पता लगता है।
| (6) अशोक के व्यक्तिगत जीवन का ज्ञान – ये अभिलेख अशोक के व्यक्तिगत जीवन की जानकारी भी देते हैं । कलिंग युद्ध का उस पर क्या प्रभाव पड़ा? बौद्ध धर्म उसने क्यों ग्रहण किया ? उसे लोक सेवा में लगने की प्रेरणा कैसे मिली ? अहिंसा व्रत उसने कब लिया ? आदि अशोक के जीवन की अनेक घटनाओं पर भी माना जा सकता है।

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