अशोक एवं मौर्य साम्राज्य का पतन

दिव्यावदान में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि बौद्ध संघों को अत्यधिक दान देने में उसका खजाना रिक्त होने लग गया। इससे साम्राज्य की सुदृढ़ता पर विपरीत प्रभाव पड़ा। वेश्याओं और नर्तकियों अथवा नाटक खेलने वालों से भी कर वसूला जाने लगा। पूर्व में जो मुद्रायें शुद्ध धातुओं में ढाली जाती थीं उनमें अन्य घटिया धातुओं के मिश्रण होने लगे। 84 हजार बौद्ध स्तूपों के निर्माण में अशोक ने 100 करोड़ रु. व्यय किये जिससे निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था ढीली पड़ गई। डासिन्हा के अनुसार अशोक की दानशीलता तथा कलाकृतियों पर अत्यन्त व्यय से अवश्य ही राजकोष खाली हो गया होगा। अशोक ने यदि बौद्ध धर्म के लिए बेहद धन व्यय किया तो सम्प्रति ने जैन धर्म के प्रचार के लिए कोष खाली कर दिया। कई इतिहासकार इस बात को स्वीकार नहीं करते कि अशोक ने राज्य की स्थिति डावाँडोल कर दी। रोनीला थापर ने तर्क द्वारा सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि सिक्कों की संकरता यह सिद्ध नहीं करती कि आर्थिक संकट उपस्थित हो गया था । पुरातत्व उत्खनन में जो मुद्राएं मिली हैं वे अपने पूर्वकालीन समय से अधिक श्रेष्ठ
| (8) करों का भार – मौर्यवंश के संस्थापक को यूनानियों एवं नन्दों का अन्त करने तथा देश को एक केन्द्रीय सत्ता के अन्तर्गत लाने हेतु बहुसंख्यक युद्ध करने पड़े और विशाल साम्राज्य की सुरक्षा के लिए निश्चय ही प्रजा पर अनेक कर लगाये गये होंगे। डॉ. कौशाम्बी। के कथनानुसार आर्थिक स्थिति शोचनीय हो जाने के कारण राजाओं को करों में अत्यधिक वृद्धि करनी पड़ी तथा सिक्कों में ह्रास हुआ। स्थिति यहाँ तक पहुंच गई कि सरकार ने नाटक खेलने वालों व वेश्याओं पर भी कर लगा दिये थे। अशोक ने बौद्ध संघ को 100 करोड़ रुपये दान दे दिया था । हजारों की संख्या में बिहार व स्तूप बनवाये जिससे उसका राजकोष ही खाली हो गया। राजकोष को भरने हेतु प्रजा पर नये नये कर लगाये गये इससे प्रजा में असन्तोष फैलना स्वाभाविक ही था। | (9) विदेशी आक्रमण – अनेक विद्वानों की मान्यता है कि यदि विदेशी आक्रमण न भी हुए होते तो भी उपरोक्त कारणों से जर्जरत मौर्य साम्राज्य स्वत: समाप्त हो जाता । विदेशी आक्रमणों ने तो इस कार्य को थोड़ा समय से पूर्व ही पूरा कर दिया था। मौर्यों के शासन काल में सर्वप्रथम विदेशी आक्रमण यूनानियों का हुआ और इससे पश्चिमोत्तर भारत से उनका प्रभाव समाप्त हो गया।
| (10) आर्थिक असमानता – डा थापर आर्थिक असमानता को मौर्य साम्राज्य के पतन का कारण मानते हैं। विस्तृत मौर्य साम्राज्य के अनेक हिस्सों में उत्पादन व आय के आर्थिक स्तरों में अन्तर था। साम्राज्य का दक्षिणी भाग कम समृद्ध था, इस भाग में उत्पादन में कमी से लोगों की आय बहुत कम थी जबकि गंगा का मैदान अधिक उपजाऊ होने के कारण अधिक समृद्धता थी । इसलिए दोनों भागों की अर्थव्यवस्था में व्यापक अन्तर था। (i) एक कृषि अर्थव्यवस्था थी जिसमें व्यापारिक हितों की अधिक सम्भावनायें थीं। (ii) एक भ्रमणशील ग्राम्य अर्थव्यवस्था थी, जिसमें व्यापार की कम सम्भावनायें थीं।
यदि मौर्य साम्राज्य में सभी क्षेत्रों का समान विकास किया गया होता तो अर्थव्यवस्था के हित में साम्राज्य में आर्थिक एकरूपता सम्भव हो पाती । दक्षिणी प्रान्तों के विकास की उपेक्षा से यहाँ का जनमानस अपने को साम्राज्य के अन्य भागों से पृथक महसूस करने लगा।
मौर्य साम्राज्य के पतन पर टिप्पणी करते हुए डा.राधाकुमुद मुकर्जी ने लिखा है हम यह नहीं भूल सकते कि उन दिनों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि साम्राज्य अगले 50 वर्षों में छिन्न भिन्न हो गया । वास्तव में आश्चर्य तो इस बात का है कि इतना विशाल साम्राज्य लगभग एक शताब्दी तक निरन्तर एक केन्द्र से शासित होता रहा। भारत में अशोक से पूर्व तथा उसके बाद भी अनेक साम्राज्य जो मौर्य साम्राज्य से विस्तार में कहीं छोटे थे अवश्य रहे होंगे । स्थानीय स्वायत्तता की भावना, दूरस्थ प्रान्तों के साथ
आवागमन की कठिनाई, सूबेदारों का अत्याचार पूर्ण शासन तथा उनकी विद्रोही प्रवृत्ति, महलों के कुचक्र तथा पदाधिकारियों का विश्वासघात आदि को हम महत्त्वपूर्ण कारण मान सकते हैं।” डा.मुकर्जी मौर्य साम्राज्य के पतन पर अपनी टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि “बाह्य आक्रमण से भी अन्य दूसरे कारणों को भी बल मिला । मौर्यों के बारे में तो इस बात के निश्चित प्रमाण हैं कि ये सब कारण कार्य कर रहे थे। तक्षशिला के दूरवर्ती प्रान्त में प्रान्ताधिपतियों के उत्पीड़न के सम्बन्ध में वह जानता था और उसने उन्हें नियंत्रित करने का प्रयत्न भी किया। पुष्यमित्र के विश्वासघातपूर्ण रवैये से स्पष्ट होता है कि राजधानी के पदाधिकारी राज्य के स्वामिभक्त दोस नहीं रह गये थे।”
। डॉ.मुकर्जी के ही कथनानुसार “यदि अशोक किसी प्रकार मौर्य साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी था तो भी इसके लिये पश्चाताप करने की आवश्कता नहीं है ।अशोक के प्रयलों द्वारा विश्व में भारतीय संस्कृति की छाप हजारों वर्षों से उसके गौरव की प्रतीक रही है और आज भी उसका प्रभाव कम नहीं हुआ है ।यह अशोक की महान उपलब्धि है ।साम्राज्य का पतन तो एक न एक दिन होना ही था।”

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